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Wednesday, 4 October 2017

#गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाने वालों को भौतिकी का #नोबेल पुरस्कार

प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों के नामों की घोषणा

स्टॉकहोम, रायटर : सापेक्षता का सिद्धांत देने वाले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के पूर्वानुमान के सौ साल बाद गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाने वाले तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों को साल 2017 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा। नोबेल पुरस्कार समिति ने मंगलवार को इस पुरस्कार के लिए रेनर विस, बैरी बैरिश और किप थोर्न के नामों की घोषणा की। गुरुत्वीय तरंगों को पहली बार सितंबर, 2015 में और चौथी बार इस साल 14 अगस्त को देखा गया था। इसकी मदद से सुदूर ब्रह्मांड में होने वाली गतिविधियों का पता लगाया जा सकेगा। 1तीनों खगोल वैज्ञानिकों को 11 लाख डॉलर (करीब 7.20 करोड़ रुपये) की इनामी राशि और प्रतीक चिह्न् दिए जाएंगे। पुरस्कार की आधी राशि रेनर विस को दी जाएगी। बाकी राशि थोर्न और बैरिश के बीच बांटी जाएगी। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसकी मदद से ब्लैक होल और न्यूट्रॉन तारों के बारे में और अधिक जानकारी जुटाई जा सकेगी। पांच दशकों से अनेक वैज्ञानिक और इंजीनियर गुरुत्वीय तंरगों की खोज में जुटे थे। नोबेल विजेताओं का चयन करने वाली समिति स्वीडिश रॉयल एकेडमी ऑफ साइंसेज के प्रमुख गोरन हैंसन ने बताया कि इस खोज ने दुनिया को हिला दिया था। तरंगों का पता लगाने के लिए अमेरिकी संस्था लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल वेव ऑब्जरवेटरी (लिगो) और इटली स्थित वगरे वेधशाला के वैज्ञानिक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। थोर्न और विस ने कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में लिगो की स्थापना की थी।स्टॉकहोम, रायटर : सापेक्षता का सिद्धांत

Saturday, 24 September 2016

जुगनू कैसे चमकता है ?


प्रकृति में बहुत से जीव और वनस्पतियां स्व प्रकाश उत्पन्न करते है जीव जो  प्रकाश (पीला, हरा, लाल) उत्पन्न करते है उसको जीवदीप्ति (Bio-luminescence) कहते है जीवदीप्ति बिना गर्मी का प्रकाश होता है ये प्रकाश शीतल होता है
जीवों में मुख्यतः कुछ मोल्स्कन,स्पंज,जेली फिश,केकड़े व कुछ जाति की मछलियाँ, lightning bugs प्रकाश उत्पन्न करते है|
पहले तक यह माना जाता रहा कि जीव फास्फोरस के कारण चमकते है लेकिन बाद में पता चल गया कि फास्फोरस के कारण ऐसा नहीं होता है|
सन् 1794 में इटैलियन वैज्ञानिक स्पेलेंज़ानी ने सिद्ध किया कि जीवों में प्रकाश उनके शरीर में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के कारण होता है ये रासायनिक क्रियाएँ मुख्यत पाचन से सम्बन्धित होती है|
यह फोटोजेन  या ल्युसिफेरिन  रसायन होता है|
इन रासायनिक क्रियाओं के कारण मुख्यत दो पदार्थ बनते है|
ल्यूसिफेरिन और ल्युसिफेरेस
आक्सीकरण क्रिया के फलस्वरूप ल्यूसिफेरिन नामक प्रोटीन आक्सीकृत हो कर चमक उत्पन्न करती है |
जुगनू दो प्रकार के होते है,
1. लैपरिड
2. क्लिक बीटल
ऐसी क्या जरूरत पडी कि जुगनू या अन्य जीवों के अंदर चमकने जैसी क्रिया विकसित हुई?
यह चमक जुगनूओं को अपना आहार बनाने और आहार बनने से बचने दोनों काम आता है नर मादा जोड़ा बनाने यानी मेंटीग के लिए आकर्षण उत्पन्न करते है या दूसरे जानवरों का शिकार करने के लिये इसका उपयोग करते हैं बार बार एक निश्चित अंतराल के बाद उत्पन्न लाईट फ्लश परभक्षियों को भ्रमित करती है ये ही सब चमकने के उपयोग है|
वैज्ञानिक जुगनुओं की इस विशेष प्रोटीन से काफी नए शोध की उम्मीदे लगाएं बैठे है वैज्ञानिकों ने fireflies की चमकने वाली  प्रोटीन का इस्तेमाल कैंसर, autoimmune रोग और कई अन्य बीमारियों का इलाज की दवाओं के लिए किया है|


Source:-

Saturday, 2 July 2016

क्या होता है बादल फटना, क्यों और कब-कब हुई ऐसी बड़ी घटनाएं?


अक्सर आपने सुना होगा कि फलां जगह पर बादल फट गया जिससें भारी तबाही मची और बड़ी तादात में जान-माल का नुकसान हुआ है। लेकिन बादल फटने का मतलब ये नहीं कि वास्तव में बादल में फट जाता है, इसका सीधा सा मतलब है कि बारिश का चरम रूप यानि सबसे अधिक मूसलाधार वर्षा होना। इस दौरान होने वाली बारिश से बहुत तेज गति से इतना ज्यादा पानी बरसता है कि बाढ़ की स्थित पैदा हो जाती है। हालांकि कई लोग इसे दैवीय प्रकोप मान लेते हैं, लेकिन ऐसा होने के पीछे विज्ञान के कुछ कारण होते हैं।


हम आपको बता दें कि बारिश भी बादलों की स्थिति के अनुसार होती है। बादल फटने अथवा जबरदस्त पानी बरसाने वाली वर्षा की घटना अमूमन पृथ्वी से लगभग 14 किलोमीटर की ऊंचाई पर घटती है। बादल फटने की घटना के दौरान होने वाली वर्षा लगभग 100 मिलीमीटर प्रतिघंटे की दर से होती है। फलस्वरूप कुछ ही देर में 2 सेंटीमीटर से अधिक बरसात हो जाती है, जिसका मतलब होता है बहुत ही अधिक मात्रा में पानी बरस जाना।


बादल फटने की घटना के पीछे दो कारण होते हैं-

1. बादलों के मार्ग में अवरोध आ जाना-
मौसम विज्ञान के मुताबिक जब बादल अत्याधिक मात्रा में आद्रता यानि पानी लेकर उड़ते हैं उस समय उनके मार्ग में यदि कोई बाधा आ जाती है तो वो फट पड़ते हैं यानि उनमें संघनन बहुत तेज गति से होता है। इसके फलस्वरूप उस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में पानी बरस जाता है। उदाहरण के लिए हर साल मानसून के समय बादल जब उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं तो उसके मार्ग में हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में सामने आता है।

2. गर्म हवा से टकराने पर भी फट पड़ते हैं बादल-
बादल आद्रता लेकर अपने मार्ग पर उड़ते रहते है और अचानक से कोई गर्म हवा का झोंका उनसे टकरा जाता है तो वो फट पड़ते हैं यानि अत्याधिक मात्रा में पानी बरस जाता है। गौरतलब है कि 26 जुलाई 2004 को मुम्बई में बादल फटने की घटना इसी वजह से हुई थी।

दुनिया में हुई बादल फटने की प्रमुख घटनाएं

-16-17 जून 2013 को केदारनाथ में बादल फट पड़े थे। उस दौरान हुई 10 और 15 मिनट तेज बारिश से भारी मात्रा में जान-माल का नुकसान हुआ।
-6 अगस्त 2010 को जम्मू और कश्मीर के लेह में बादल फटे थे। उस समय 1 मिनट बारिश में 1.9 इंच पानी बरस गया था।
-26 नवंबर 1970 को हिचाचल प्रदेश के बरोत में बादल फटे थे। उस दौरान हुई 1 मिनट तेज बारिश में 1.5 पानी बरसा था।
-29 नवंबर 1911 को पोर्ट बेल्स, पानामा में भी बादल फटे थे। उस दौरान हुई 5 मिनट बारिश में 2.43 इंच पानी बरस गया था।
-12 मई 1916 को प्लम्ब प्वॉइंट, जमैका में बदल फटे थे। उस दौरान हुई 15 मिनट बारिश में 7.8 इंच पानी बरस पड़ा था।
-7 जुलाई 1947 को कर्टी-दे-आर्गस, रोमानिया में बदल फटे थे। उस समय हुई 20 मिनट बारिश में 8.1 इंच पानी बरसा था।
-24 अगस्त 1906 को अमरीका के वर्जीनिया प्रांत के गिनी में बादल फटे थे। इस दौरान सबसे अधिक 40 मिनट बरसात हुई जिसमें 9.25 इंच पानी बरसा था जिससे भारी तबाही हुई थी।

Wednesday, 25 May 2016

How is it possible for insects and spiders to walk on water or on the walls?

Tiny insects can walk on water because of the phenomenon of surface tension.  The unbalanced intermolecular force makes the surface behave like a stretched membrane.  The classical demonstration of the carrying capacity of this membrane is to gently lay flat a shaving blade(to ensure that the weight per unit area is kept low)  upon the surface of still water;  the blade does not sink.  The blade is heavier than an equal volume of water and would surely sink if the force of surface tension were absent.  Thus,  one can easily understand why insects and larvae can float on the surface of water.  As regards the ability of insects to walk on walls,  several explanations are provided.  The most popular isthe hypothesis that such creatures have suction cups on their feet using which they can stick to walls and recent ceilings.  Some special investigations indicate a construction of the feet; thousands upon thousands tiny protruding hair-like projections stick to surfaces due to molecular forces.

Tuesday, 24 May 2016

Where does the water dripping out of your Air Conditioner come from?

The water dripping out is same as the water droplets which forms over a cold water bottle when it is placed outside the refrigerator.

An air conditioner sucks in the outside air and passes it over fin-like projections,  which have been cooled by the compressor.  It cools the inside of a room while heating the outside.  The outside air is not only hot but often it is also quite humid when passed over the cold fins the temperature of air drops below the dew point and excess moisture condenses out.
This condensed moisture is the water which drips out of your AC machine.
                   In a humid day, you will find lot of water coming out of your AC than on a normal day.

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Sunday, 8 May 2016

How do astronauts drink in space?


Astronauts drink in space by using special equipment, such as internally pressurized bottles, collapsible pouches, drinking tubes and coffee cups designed to function in zero gravity.



FULL ANSWER
Overcoming the dilemma of how to drink in space involves compensating for an environment in which there is no gravity. Liquids cannot be poured or sipped, or they float away. Drinks are sent into space as dehydrated powder, and astronauts add water through a special tube to liquefy them. The zero-gravity coffee cup uses a special principle involving a container with a sharp angle that allows the coffee to flow to the astronaut's mouth. In experiments with carbonated beverages, such as soft drinks and beer, astronauts found that the carbon dioxide bubbles, instead of floating to the top, remain evenly distributed throughout the drink. This creates a beverage that is overall much more foamy. To allow astronauts to drink carbonated drinks, researchers devised a special bottle with a collapsible bag inside. The bottle maintains a steady pressure around the drink. Soft drinks were dispensed and beer was brewed aboard the space station as experiments, but these beverages are not yet standard fare.
To provide the water for drinks in space, most of the liquids used on the space station are recycled, including breath exhalation, sweat, urine and water from tooth brushing and hand washing. Water is expensive to bring from Earth, so it is important to make every drop count, though some is inevitably lost from airlocks, CO2 removal systems and water recycling systems.

Transporting anything to the space station is extremely expensive—launching a SpaceX rocket costs more than $1800 per pound. And you know what’s really heavy? Water.
Tanks of H20 can't be constantly shipped up to the International Space Station, so the station has a complex water system that squeezes every last drop of available, drinkable liquid out of the environment. That leaves astronauts drinking a filtered mixture that includes recycled shower water, old astronaut sweat, and pee. The station also keeps about 530 gallons of water in reserve in case of an emergency.
The NASA water systems on the ISS collect moisture from breath and sweat, urine from people and research animals, and runoff from sinks and showers to keep the station hydrated. “It tastes like bottled water, as long as you can psychologically get past the point that it’s recycled urine and condensate that comes out of the air,” Layne Carter, who manages the ISS water system from the Marshall Flight Center in Alabama, told Bloomberg Businessweek.
However, not all the ISS astronauts drink recycled urine. The ISS is split into two sections, one run by Russia, and one by the United States, and they have two different water systems. The U.S. system collects condensate, runoff, and urine to create about 3.6 gallons of drinkable water per day. However, the Russian astronauts drink water processed from only shower runoff and condensate, skipping the urine (producing slightly less than that 3.6 gallons). Occasionally, the NASA astronauts will go over to the Russian side of the ISS and grab the Russian supplies of urine to process it themselves. No need to waste potential water supplies!
In addition, the two sides of the ISS disinfect their water two different ways. Since 1981, NASA has been using iodine to disinfect water, a process that requires the water to be filtered since too much iodine can cause thyroid issues. Russia has been using silver to disinfect its water since the launch of the Mir station by the Soviet Union in 1986.



Sunday, 10 April 2016

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?

विज्ञान के अब तक के सभी प्रयासों के बावजूद पृथ्वी के बाहर किसी स्थान पर जीवन होने की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है। पृथ्वी पर एक कोषिकीय, बहुकोशिकीय, कवक, पादप, जन्तु आदि लाखों प्रकार के जीव पाए जाते हैं मगर वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि इन सब का प्रथम पूर्वज एक ही था। आज भी इस प्रश्न का उत्तर जानना शेष है कि सभी जीवों का प्रथम पूर्वज पृथ्वी पर ही जन्मा था या किसी अन्य खगोलीय पिण्ड से पृथ्वी पर आया? प्रथम जीव की उपपत्ति में ईश्वर जैसी किसी शक्ति की कोई भूमिका रही है या यह मात्र प्राकृतिक संयोग की देन है? प्रथम जीव के अजीवातजनन को समझाने वाले ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों को भी जोरदार चुनौति दी जा रही है।
लगभग सभी धर्मों में विशि‍ष्ट सृजन की बात कही गई है। इस मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों को ईश्वर ने ठीक वैसा ही बनाया जैसे वे वर्तमान मे पाए जाते हैं। मनुष्य को सबसे बाद में बनाया गया। इस मान्यता में विश्वास करने वाले इसाई धर्म गुरु आर्चबिशप उशर (Archbishop Ussher) ने सन् 1650 में अपनी गणना के आधार पर बताया था कि ईश्वर ने विश्व सृजन का कार्य 01 अक्टोबर 4004 ईसापूर्व को प्रारम्भ कर 23 अक्टोबर 4004 ईसा पूर्व को पूरा किया। इस मान्यता के पक्ष में किसी प्रकार के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
अपने अवलोकनों के आधार पर अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने निर्जीव पदार्थों से जीवों की उपपत्ति को समझाने का प्रयास किया। इस मान्यता के अनुसार प्रकृति में निर्जीव पदार्थों जैसे कीचड़ से मेढ़क, सड़ते मांस से मक्खियां आदि सजीवों की उत्पत्ति होती रहती है। वान हेल्मोन्ट (Van Helmont) जैसे वैज्ञानिक ने प्रयोग द्वारा पुराने कपड़ों व अनाज द्वारा चूहे जैसे जीव पैदा होने की बात प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का प्रयास भी किया था। निर्जीव पदार्थों से सजीव उत्पन्न होने की मान्यता उन्नीसवीं शताब्दि में तक चलती रही जबतक लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों के बल पर निर्विवाद रूप से इसका अन्त नहीं कर दिया। आज सभी यह जानते है कि कोई भी जीव पहले से उपस्थित अपने जैसे जीव से ही उत्पन्न हो सकता है मगर यह प्रष्न अभी भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहला जीव कहाँ से आया?
प्रथम जीव का अजैविक जनन
जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकार कर प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीव की उत्पत्ति की सर्वप्रथम विवेचना करने का श्रेय चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) को जाता है। अपनी पुस्तक आॅरिजन आॅफ स्पेसीज (Origin of Species) में पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों की उत्पत्ति को जैवविकास के सिद्धान्त से समझाते हुए चार्ल्सडार्विन, चर्च के डर से, ईश्वर की भूमिका को पूरी तरह नकार नहीं सके थे। अपनी इच्छा के विपरीत डार्विन को यह बहना पड़ा कि ईश्वर ने सभी जीवों को अलग अलग नहीं बना कर एक सरल जीव बनाया तथा वर्तमान सभी जीवों की उत्पत्ति उस एक पूर्वज से, जैव विकास की विधि द्वारा हुई है। अपने मित्रों तथा अन्य जिज्ञासुओं से डार्विन ने अपने विचार की असलियत को नहीं छुपाया। 
डार्विन ने जीव की उपपत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकारते हुए कहा था कि प्रथम जीव की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई। 01 फरवरी 1871 को उत्पत्ति को लिखे पत्र में चार्ल्स डार्विन ने संभावना प्रकट कि अमोनिया, फास्फोरस आदि लवण घुले गर्म पानी के किसी गढ्ढे में, प्रकाश, उष्मा, विद्युत आदि के प्रभाव से, निर्जीव पदार्थां से पहले जीव की उत्पत्ति हुई होगी।
रुसी वैज्ञानिक अलेक्जेण्डर इवानोविच ओपेरिन(Alexander Ivanovich Oparin) ने 1924 में जीव की उत्पत्ति नाम से निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का सर्व प्रथम सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। ओपेरिन ने कहा कि लुई पाश्चर का यह कथन सच है कि जीव की उत्पत्ति जीव से ही होती है मगर प्रथम जीव पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता। प्रथम जीव की उत्पत्तितो निर्जीव पदार्थों से ही हुई होगी। ओपेरिन ने कहा कि सजीव व र्निजीव में कोई मूलभूत अन्तर नहीं होता। रसायनिक पदार्थों के जटिल संयोजन से ही जीवन का विकास हुआ है। विभिन्न खगोलीय पिण्डों पर मिथेन की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल मिथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जल वाष्प से बना होने के कारण अत्यन्त अपचायक रहा होगा। इन तत्वों के संयोग से बने योगिकों ने आगे संयोग कर और जटिल योगिकों का निर्माण किया होगा। इन जटिल योगिकों के विभिन्न विन्यासों के फलस्वरूप उत्पन्न नए गुणों ने जीवन की नियमितता की नींव रखी होगी। एक बार प्रारम्भ हुए जैविक लक्षण ने स्पर्धा व संघर्ष के मार्ग पर चलकर वर्तमान सजीव सृष्टि का निर्माण किया होगा। 
अपने सिद्धान्त के पक्ष में ओपेरिन ने, कुछ कार्बनिक पदार्थों के व्यवस्थित होकर कोश‍िका के सूक्ष्म तन्त्रों में बदलने उदाहरण दिए। बाद में डच वैज्ञानिक जोंग के द्वारा किए गए प्रयोगों में बहुत से कार्बनिक अणुओं के आपस में जुड़ कर विलयन से भरे पात्र जैसी सूक्ष्म रचनाओं के बनने से ओपेरिन के सिद्धान्त को बल मिला। कार्बनिक अणुओं की पर्त से बने सूक्ष्म पात्रों को ही डी जुंग ने कोअसरवेट नाम दिया था। कोअसरवेट द्वारा परासरण जैसी क्रियाओं के प्रर्दशन के कारण इन्हें उपापचय क्रियाओं का आधार मानते हुए जीवन के प्रथम के घटक के रूप में देखा गया। ओपेरिन का मानना था कि आद्य समुद्र में अनेकानेक कोअसरवेट बने होगे तथा उनके जटिल संयोजन से ही अचानक प्रथम जीव की उत्पत्ति हुई होगी। 
1929 में जे.बी.एस. हाल्डेन (JBS Halden) ने ओपेरिन के विचारों को ओर विस्तार दिया। हाल्डेन ने पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर सुकेन्द्रकीय कोषिका की उत्पत्ति तक की घटनाओं को आठ चरणों में बांट कर समझाया। हाल्डेन ने कहा कि सूर्य से अलग होकर पृथ्वी धीरे धीरे ठण्डी हुई तो उस पर कई प्रकार के तत्व बन गए। भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र की ओर गए तथा हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन आर्गन से प्रारम्भिक वायुमण्डल बना। वायुमण्डल के इन तत्वों के आपसी संयोग से अमोनिया व जलवाष्प बने। इस क्रिया में पूरी आॅक्सीजन काम आजाने के कारण वायुमण्डल अपचायक हो गया था। सूर्य के प्रकाश व विद्युत विसर्जन के प्रभाव से रसायनिक क्रियाओं का दौर चलता रहा और कालान्तर में अमीनो अम्ल, शर्करा, ग्लिसरोल आदि अनेकानेक प्रकार के यौगिक बनते गए। इन यौगिको के जल में विलेय होने से पृथ्वी पर पूर्वजीवी गर्म सूप बना। 
सूप का घनत्व बढ़ता गया तथा उसमें कोलायडी कण बनने लगे। जल की सतह पर तैरते इन कणों ने आपस में जुड़कर झिल्ली का रूप लिया होगा। इस झिल्ली ने बाद में सू़क्ष्म पात्रों का निर्माण कर लिया जिन्हे कोसरवेट नाम दिया था। इस प्रकार जीवनपूर्व रचनाओं का उदय हुआ होगा। एन्जाइम जैसे उत्प्रेरकों के प्रभाव के कारण कोसरवेट में भरे रसायनों में संश्लेषण विश्लेषण जैसी क्रियाएं होने लगी होगी। धीरे धीरे अवायु श्वसन होने लगा। कोअसरवेट में कोई रसायन कम होता तो बाह्य वातावरण से अवषोषण कर उसकी पूर्ती करली जाती। चिपचिपेपन के कारण कोअसरवेट का आकार बढ़ता रहता तथा अधिकतम आकार होजाने पर वह स्वतः विभाजित होजाता था। बाद में नाभकीय अम्लों के रूप में कार्बनिक नियन्त्रक-तन्त्र विकसित हुए जो वृद्धि व जनन जैसी जैविक क्रियाओं को नियन्त्रित करने लगे। प्रारम्भिक कोषिका परपोषी प्रकार की रही होगी। बाद में पर्णहरित यौगिक तथा हरितलवक कोषिकांग के कोषिका में प्रवेष करने से पहली स्वपोषित कोषिका बनी होगी। प्रकाष संष्लेषण की क्रिया के प्रारम्भ होने पर जल का विघटन होने लगा जिससे आक्सीजन उत्पन्न होने लगी। वायुमण्डल में आॅक्सीजन की मात्रा साम्य स्थापित होने तक बढती रही होगी।

स्टेनले मिलर का प्रयोग
ओपेरिन तथा हाल्डेन की कल्पनाओं का कोई प्रयोगिक आधार नहीं था। 1953 में स्टेनले मिलर (Stanley Miller) ने ‘‘प्रारम्भिक पृथ्वी अवस्था में अमीनो अम्लों का उत्पादन संभव’’ लेख प्रकाषित कर ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों का समर्थन किया। स्टेनले मिलर ने अपने गुरु हारोल्ड यूरे के निर्देषन में एक बहुत ही अच्छे प्रयोग की योजना तैयार कर उसे क्रियान्वित किया था। मिलर ने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर यह देखना चाहता था कि क्या ओपेरिन ने जो कहा वैसा होना सम्भव है? 

मिलर ने प्रयोग करने के लिए एक विद्युत विसर्जन उपकरण बनाया। उपकरण में एक गोल पेंदे का फ्लास्क, एक विद्युत विसर्जन बल्ब तथा एक संघनक लगा था। गोल पेंदे के फ्लास्क में पानी भरने के बाद उपकरण में हवा निकाल कर उसमें मिथेन, अमोनिया व हाइड्रोजन को 2:1:2 अनुपात में भर दिया गया। विद्युत विसर्जन के साथ साथ पानी को उबलने दिया जाता तो उत्पन्न भाप के प्रभाव के कारण गैसे निरन्तर वृत में घूमती रहती। विद्युत विर्सजन बल्ब से निकलने वाली जलवाष्प के संघनित होने पर उसे विष्लेषण हेतु बाहर निकाला जा सकता था। मिलर ने निरन्तर एक सप्ताह विद्युत विर्सजन होने के बाद संघनित द्रव का विष्लेषण किया। विश्लेषण करने पर उस द्रव में अमीनो अम्ल, एसिटिक अम्ल आदि कई प्रकार के कार्बनिक पदार्थ उपस्थित पाए गए। 

मिलर के प्रयोग द्वारा ओपेरिन के रसानिक विकास की परिकल्पना की पुष्टि होने से इस सिद्धान्त की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। मिलर के प्रयोग के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि शनि के उपग्रह टाइटन के वायुमण्डल में जीव की उत्पत्ति की संभावना की पड़ताल के सन्दर्भ में इस प्रयोग को पुनः दोहराया गया है। प्रयोग से प्राप्त आकड़ों के आधार पर कहा जाने लगा है कि जल की अनुस्थिति में भी वायुमण्डल में जीवन के घटकों का संश्लेषण संभव है।

मिलर के प्रयोग से पृथ्वी के प्रारम्भिक वातावरण में कार्बनिक अणुओं के बनने की बात तो समझ में आगई थी मगर अब प्रश्न यह था कि इन एकल अणुओं ने आपस में जुड़ कर बहुलक अणुओं का निर्माण किस प्रकार किया होगा? 1950 से 1960 के मध्य सिडनी फोक्स (Sidney Fox) ने कुछ प्रयोग किए जिनमें यह पाया गया कि पृथ्वी के प्रारम्भिक समय में अमीनो अम्ल स्वतः ही पेप्टाइड बंधों से जुड़ कर पोलीपेप्टाइड बनाने में सफल रहे होंगे। ये अमीनो अम्ल तथा पोलीपेप्टाइड जुड़ कर गोलाकार झिल्ली व प्रोटीनाॅइड माइक्रोस्फेयर में व्यवस्थित होसकते थे जैसा कि प्रारम्भिक जीवन रहा होगा।

मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है जीवन
जीवन मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है। जीवन के विषय में ज्यों ज्यों जानकारी बढ़ती जा रही है प्रथम जीव की उत्पत्ति को समझाना उतना ही कठिन होता रहा है। जीवन की संरचना व उसकी कार्य प्रणाली को 1992 में हारोल्ड होरोविट्ज(Harold Horowitz) ने निम्न बिन्दुओं में समझाया- 

1. जीव कोश‍िका से बना होता है।
2. प्रत्येक कोश‍िका का 50 से 90 प्रतिषत भाग जल का बना होता है। जल ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में हाइड्रोजन, प्रोटोन तथा आक्सीजन की आपूर्ति करता है तथा जैव अणुओं के लिए विलायक की भूमिका निभता है। 

3. जीवन के निमार्ण में प्रयुक्त अधिकांश सहसंयोजक जैव-अणु कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन, फास्फोरस तथा गंधक से बने होते हैं। 

4. जैव-अणुओं जैसे शर्करा, अमीनोअम्ल, न्यूक्लियोटाइड, वसीयअम्ल, फोस्फोलिपिड, विटामिन तथा सहएन्जाइम आदि से बना एक छोटा समूह ही सम्पूर्ण सजीव सृष्टि का निर्माता है। 

5. प्रत्येक जीव के गठन में प्रमुख भाग बड़े अणुओं प्रोटीन, लिपिड, कार्बोहाइड्रेट व नाभकीय अम्ल का होता है।
6. सभी जीवों की कोषिकाओं में एक ही प्रकार की दोहरी लिपिड झिल्ली पाई जाती है। 

7.सभी जीवों में ऊर्जा का प्रवाह फास्फेट बंध (एटीपी) के जल अपघटन के माध्यम से होता है।

8.सम्पूर्ण सजीव जगत में उपापचय क्रियाएं एक छोटे समूह-ग्लाइकोलाइसिस, क्रेब्स चक्र, इलेक्ट्रोन स्थानान्तरण श्रंखला के माध्यम से सम्पन्न होती है।

9. विभाजित होने वाली प्रत्येक कोषिका में डीएनए का एक सेट जिनोम के रूप में होता है। यह आरएनए के रूप में सूचना निर्देष भेजता है जिसका अनुवाद प्रोटीन के रूप में होता है।

10. वृद्धि करती प्रत्येक कोषिका में राइबोसोम पाए जाते हैं जो प्रोटीन संष्लेषण करते हैं।

11. प्रत्येक जीन सूचनाओं का अनुवाद न्यूक्लियोटाइड भाषा से विषिष्ट एन्जाइम के सक्रियण व ट्रान्सफर आरएनए के रूप में करता है।

12. जनन करने वाला प्रत्येक जीव, उसके जीनोटाइप में उत्परिवर्तन के कारण, स्वयं से कुछ भिन्न सन्तानें उत्पन्न करता है।

13. सभी जीवित कोषिकाओं में पर्याप्त तीव्र गति से होने वाली रसायनिक क्रियाएं एन्जाइमों से उत्प्रेरित होती हैं। 
जीवन की उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट है कि जीवन कार्बनिक अणुओं या उनके बहुलकों का विषिष्ट समूह मात्र नहीं है। जीवन में कोश‍िका झिल्ली, उपापचय क्रियाएं, जिनोम, एन्जाइम आदि अनेक तन्त्र अद्भुत सन्तुलन के साथ क्रियाशील रहते हैं। किसी की भी अनुपस्थिति में जीवन की कल्पना नहीं की जाकती। जीवन के विकास की बात करने पर यह तो सम्भव नहीं हैं कि प्रकृति में ये सभी तन्त्र एक साथ विकसित होकर साथ काम करने लगे होंगे। यदि इनका विकास अलग अलग हुआ तो कौन पहले और कौन बाद में बना। यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण कि किसी तन्त्र विषेष के बनने तक शेष तन्त्रों का कार्य कैसे चला होगा? यह कोई एक प्रश्न नहीं अपितु प्रश्नों का समुच्चय है जिनका जबाव खोजना चुनौति भरा कार्य है। वैज्ञानिक इस अनबुझ पहेली से खबराए नहीं हैं। हजारों वैज्ञानिक अनवरत रूप से इन प्रष्नों के हल तलाशने में लगे हैं। यहाँ हम कुछ प्रमुख प्रयासों की चर्चा करेंगे।

उष्णजलीय रन्ध्र (हाइड्रोथर्मल वेन्ट) सिद्धान्त
लम्बे समय से चले आ रहे ओपेरिन व हाल्डेन के विचार को उस समय गहरा धक्का लगा जब कई युवा वैज्ञानिकों ने इस बात से असहमति जताई कि आद्यसूप में जन्मे प्रथम जीव ने अपनी ऊर्जीय आवश्कताओं की पूर्ती अवायु श्वशन द्वारा की होगी। उनका कहना है कि ओपेरिन व हाल्डेन के विचार जैव-और्जिकी व उष्मागतिक सिद्वान्तों के अनुरूप नहीं है। 

प्रोफेसर विलियम मार्टिन (Professor William Martin) के निर्देशन में भूरसायनिज्ञ माइकील रुस्सेल (Michael Russell) ने जीव की प्रथम उत्पत्ति का वैकल्पिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उष्णजलीय रन्घ्र सिद्धान्त नाम के इस सिद्धान्त में कहा गया कि जीव उत्पत्ति आद्यसूप में नहीं होकर समुद्र के पेंदे पर धात्विक लवणों से निर्मित चट्टानों पर बने सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों में हुई होगी। जल में विलेय हाइड्रोजन, कार्बन डाय आक्साइड, नाइट्रोजन व हाइड्रोजन सल्फाइड गैसों ने इन रध्रों में प्रवेश कर विभिन्न प्रकार के कार्बनिक योगिको को जन्म दिया होगा। सूक्ष्म दूरी पर स्थित इन रंध्रों के मध्य ठीक वैसी ही रसायनिक प्रवणता स्थापित हुई होगी जैसी वर्तमान कोषिका में उत्पन्न होती है। प्रारम्भिक जीव ने रसायनिक-परासरण के माध्यम से रसायनिक प्रवणता का उपयोग कर ऊर्जा की वैष्विक मुद्रा एटीपी या उसके समकक्ष किसी अन्य का उपयोग किया होगा। 

इस प्रकार प्रारम्भिक जीवन अपनी ऊर्जा आवष्यकताओं की पूर्ती हेतु धरती माँ पर निर्भर रहा होगा। कालान्तर में जीवन ने अपना स्वयं का प्रोटोन प्रवणता तन्त्र विकसित कर इलेक्ट्रोन का स्थानान्तरण करना सीख लिया होगा। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों का मानना है कि हाइड्रोजन ने प्रथम इलेक्ट्रोन दाता तथा कार्बन डाय आक्साइड ने प्रथम ग्राहाता की भूमिका निभाई होगी। अपना ऊर्जा उत्पादन तन्त्र विकसित करने के बाद जीवन सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों से बाहर स्वतन्त्र जीवन जीने लगा होगा। आज सभी जीव रसायनिक परासरणी है, प्रथम जीव भी ऐसा ही रहा होगा।

आर.एन.ए. विश्व
वर्तमान जीवन पूर्णतः डी.एन.ए. आधारित है। डीएनए में संग्रहित सूचना को केन्द्रक के बाहर कोश‍िका द्रव्य में आरएनए लेजाता है। कोश‍िका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम डीएनए से प्राप्त सूचना के अनुरूप प्रोटीन (एन्जाइम) का संष्लेषण करते है। प्रोटीन के उत्प्रेरण से ही जीवन की सभी क्रियाएं निर्देश‍ित होती है। कोषिका में सभी प्रकार के निर्माण होते हैं। डीएनए के संश्लेषण में कई प्रकार के प्रोटीन (एन्जाइम) की भूमिका होती है। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जीवन विकास के क्रम में पहले डीएनए आया या प्रोटीन? 

बहुत सम्भव है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में डीएनए नहीं था। आरएनए अपनी भूमिका के साथ डीएनए व प्रोटीन की भूमिका भी अभिनीत किया करता होगा। 1983 में थोमस केचतथा सिडनी अल्टान (Sidney Altman) ने स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए राइबोजाइम की खोज की। इन वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि आरएनए को अपने निर्माण व परिवर्तन में किसी प्रोटीन की आवश्यकता नहीं होती। प्रोटीन की तरह कार्य कर सकने वाले आरएनए को ही राइबोजाइम नाम दिया गया। इस परिकल्पना के अनुसार एक समय ऐसा था जब अणु जगत का सुप्रिमो आरएनए ही था। उस काल को आरएनए विष्व के नाम से जाना जाता है। आरएनए विष्व की अवधारणा विकसित करने पर थोमस केच तथा सिडनी अल्टान को नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाद में डीएनए ने आरएनए की कई भूमिकाओं को उससे छीन लिया। आरएनए के द्विगुणन तथा स्पालसिंग में राइबोजाइम आज भी सक्रिय है। 

यह प्रश्न विचारणीय है कि आरएनए संष्लेषण की क्रिया प्रणाली भी इतनी सरल तो नहीं कि जीवन के प्रारम्भ से ही इसकी भूमिका को स्वीकार लिया जाय? 2009 में जोहन सुथरलैण्ड(John Sutherland) ने जीवन पूर्व परिस्थितियों में आकस्मिक रूप से पायरीमीडीन न्यूक्लियोटाइड एकलक श्रंखला का संश्लेषण संभव बता कर आरएनए विश्व की संभावना को बल प्रदान किया है। प्यूरीन न्यूक्लियोंटादड एकलक श्रंखला का संश्लेषण की संभावना का प्रतिपादन अभी नहीं हुआ है।

समहस्तता का विकास
अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि असममित कार्बन यौगिक होते हैं और प्रकाश समावयता का गुण प्रदर्शित करते हैं। इनके अणु प्रतिबिम्ब आकृति लिए दो रूप के होते हैं। एक रूप समध्रुवी प्रकाश को बांई और तो दूसरा रूप समध्रुवी प्रकाश को दांई रूप घूमाने का गुण रखता है। पहले प्रकार के अणुओं को वास्तहस्त तथा दूसरे को दक्षिणहस्त रूप अणु कहते हैं। प्रयोगशाला में इनका निर्माण करने पर दोनों रूप साथ साथ व समान मात्रा में बनते हैं। एक अनुपात एक के इस रैसेमिक मिश्रण का समध्रुवित प्रकाश पर कोई असर नहीं होता। 

आश्चर्य की बात है कि जीवन की संरचना में लगे असममित अणु जैसे अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि समहस्तता का प्रदर्षन करते हैं। केवल वामहस्ती अमीनो अम्ल ही प्रोटीन बनाने व दक्षिण हस्ती शर्करा नाभकीय अम्लों के निर्माण में उपयोगी होती है। अध्ययन से पता चलता है कि समहस्तता जीवन की अनिवार्यता है। कई दषकों से अनुसंधानकर्ता इस चमत्कार का जबाव खोजते रहे हैं कि समहस्तता व जीवन का साथ कब से व किस कारण से हुआ?

अभी हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों से इस बात का पता चला है कि जीवन के साथ समहस्तता का जुड़ाव कोई चमत्कार नहीं होकर एक प्राकृतिक घटना है। इस विषय में पहला प्रमाणमुरकीशन उल्का के अध्ययन से प्राप्त हुआ है। मुरकीशन उल्का का नामकरण आॅस्ट्रेलिया के उस स्थान के नाम कर किया गया है जहाँ 28 सितम्बर 1969 को यह उल्कापात हुआ था। इस उल्का का रसायनिक विश्लेषण करने पर अन्य पदार्थों के साथ इसमें कई प्रकार के अमीनोअम्ल भी पाए गए। इनमें कुछ अमीनो अम्ल वे थे जो पृथ्वी के जीवों के प्रोटीन में पाए जाते हैं तो कई ऐसे अमीनो अम्ल भी थे जो प्रोटीन बनाने में काम नहीं आते हैं। 

हमारे रुचि कि बात यह है कि मुरकीशन उल्का में पाए गए कई अमीनों अम्लों के वाम व दक्षिण हस्त रूप बराबर अनुपात में नहीं थे। ग्लेविन तथा डोरकिन ने एक अध्ययन में वामहस्ती आइसोवेलीन की मात्रा उसके दक्षिणहस्ती रूप से 18 प्रतिशत अधिक पाई। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि समहस्तता के गुण का विकास किसी उत्प्रेरक क्रिया के कारण प्रकृति में उत्पन्न हुआ है। बाद के अध्ययनों में पाया गया कि कई प्रकार के धात्विक क्रिस्टल के प्रभाव से या अन्य किसी रसायन के प्रभाव से वामहस्त या दक्षिण रूप अणुओं का अनुपात बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमीनो अम्लों में समहस्तता जीवनपूर्व काल में स्थापित होगई होगी तथा बाद में एन्जाइम के रूप में इसका प्रभाव र्शकरा पर हुआ होगा। आगे के अनुसंधान इस बात को और स्पष्ट कर सकेंगे।

पहले विकसित हुए उपापचय तन्त्र
जीवन की जटिलता को देखते हुए कई वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति से पूर्व कई उपापचय चक्रों का स्वतन्त्र रूप से विकास हो चुका होगा तथा बाद में जीवन ने उनका उपयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु किया होगा। वर्तमान मे उपापचय तन्त्रों का नियन्त्रण-निर्देशन एन्जाइमों के माध्यम से आनुवंषिक अणुओं द्वारा होता है। हम पूर्व में भी चर्चा कर चुके हैं कि आनुवंषिक पदार्थ डीएनए तथा आरएनए के संष्लेषण में उपाचय-तन्त्रों की भूमिका होती है। उपापचय तन्त्र के पहले विकसित होने की परिकल्पना में कहा गया है कि आरएनए विश्व के विकास से पूर्व न्यूक्लियोंटाइडों, ओलिगोन्यूक्लियोटाइडों आदि का संश्लेषण संभव हुआ होगा। 

उष्णजल रन्ध्रों में जीवन की उत्पत्ति के समय समुद्र के तले में चट्टानों की सतह पर उपापचय चक्रों का विकास हुआ होगा। कार्बन डाइ आक्साइड व जल के अणुओं के आकस्मिक संयोग से एसीटेट जैसा दो कार्बन परमाणु युक्त अणु बना होगा। इसके बाद खनिज लवणों व चट्टान सतह पर उपस्थित रन्ध्रों के उत्प्रेरकीय प्रभाव के कारण सरल कार्बनिक अणुओं के संष्लेषण के विभिन्न परिपथों का सूत्रपात हुआ होगा। प्रारम्भ में सरल अमीनों अम्ल व लिपिड अणुओं का संष्लेषण हुआ होगा व कालान्तर में सरल कार्बनिक यौगिकों के उत्प्रेरण प्रभाव से जटिल कार्बनिक अणु बनने लगे होंगे। 

इनमें कुछ सरल पेप्टाइड भी रहे होंगे। पेप्टाइडों के बनने से उत्प्रेरण की क्रिया और तेज हुई होगी जिसके परिणाम स्वरूप जटिल अमीनोअम्ल तथा न्यूक्लियोटाइड अणु अस्तित्व में आए होंगे। समहस्तता व आरएनए विष्व के विकास में इन उपापचय परिपथों की भूमिका रही होगी। जेम्स ट्रेफिल, हारोल्ड मारोविट्ज तथा इरिक स्मिथ ने अपने प्रयोगों के माध्यम से बताया कि अपचायक साइट्रिक अम्ल चक्र वर्तमान कोशि‍का में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक अणुओं के संश्लेषण में समर्थ है। साइट्रिक अम्ल चक्र को अभी तक ऊर्जा उत्पादक परिपथ के रूप ही देखा जाता रहा है। कोशि‍का की संरचना में इसकी भूमिका को पहली बार स्वीकार किया गया है।

सूर्य से पुराना है पृथ्वी पर जीवन
प्रथम जीव पृथ्वी पर नहीं जन्मा अपितु सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में अन्तरिक्ष के किसी जीव धारी पिण्ड से आया है यह परिकल्पना जीव विज्ञान के इतिहास में बहुत पुरानी है। लार्ड केल्विन (Lord Kelvin), वोन होलमहोल्ट्ज (Von Helmholtz) आदि ने उन्नीसवी शताब्दि में इस बात को प्रतिपादित किया था। फ्रेड हाॅयल (Fred Hoyle),विक्रमसिंघे (vikram singhe), जयन्त विष्णु नार्लीकर(Jayant Vishnu Narlikar) आदि ने बीसवीं शताब्दी में इसी बात को नए तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया फिर भी आद्यसूप-परिकल्पना के मुकाबले यह विचार अधिक वजन ग्रहण नहीं कर पाया। अब स्थितियाँ बदलने लगी हैं। अनुसंधान के नए उपकरणों के विकास के बाद अब ऐसे तथ्य जुटने लगे हैं जिनके के आधार पर वैज्ञानिक अब मजबूती के साथ कह रहे हैं कि प्रथम जीव की उत्पत्ति पृथ्वी पर नहीं हुई थी। पृथ्वी पर पहला जीव बाहर से आया था।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के पक्ष में अब तब जुटाए सभी तथ्यों को नकारते हुए इन वैज्ञानिकों का कहना है कि रसायनिक पदार्थों के आकस्मिक संयोग से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात करना ठीक वैसा ही है जैसा मंगल ग्रह पर कम्पयूटर मिलने पर कोई यह दावा करे कि इस कम्प्यूटर का रेण्डम संयोजन मिथेन कुण्ड में हुआ है। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों से अबतक जुटाए तथ्यों का गहन अध्ययन करने के बाद डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ (Dr. Rhawn Joseph) ने प्रदिपादित किया है कि पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन सूर्य तथा उसके सौर मण्डल से भी पुराना है। जोसेफ की बात सुनने में अविश्वसनीय लगती है मगर अपनी बात के पक्ष में उन्होंने जो तथ्य जुटाए हैं उन्हें झुठलाना मुश्किल है।

वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार पृथ्वी की उम्र 4 अरब 54 करोड़ वर्ष है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 3 अरब 80 करोड़ वर्ष पूर्व तक के काल को वैज्ञानिक हैडीएन काल कहते हैं। यह पृथ्वी के जीवन का सर्वाधिक कठिनकाल माना जाता है। इस काल में पृथ्वी पर निरन्तर उल्कापात होता रहा था। ज्वालामुखियों की सक्रियता के कारण तापक्रम इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी पिघल गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सतह पर उपस्थित भारी धातुओं ने पृथ्वी के केन्द्र की ओर खिसककर केन्द्रीय सघन भाग का निर्माण किया। उस काल में बनी चट्टानों से प्राप्त सूक्ष्म जीवाष्मों का अध्ययन करने से पता चलता है कि लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाष संश्लेषी जीवन उपस्थित था। यदि यह तथ्य सही है तो मात्र 58 करोड़ वर्ष में रसायनिक प्रक्रियाओं द्वारा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात को सही नहीं माना सा सकता। ऐसे में पृथ्वी के बाहर से जीव के आने का विकल्प ही रहता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि हेडीयन काल में जीवन सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में पृथ्वी पर बरसा होगा। मंगल पर भी लगभग उसी समय जीवन पहुँचा होगा। आज इस बात के पक्ष में प्रबल प्रमाण मिल रहे है कि सूक्ष्म बीजाणु किसी एक ग्रह के वायु मण्डल से निकल कर, अन्तरिक्ष की लम्बी व कठिन यात्रा सफलता पूर्वक पूरी कर, किसी अन्य ग्रह पर उतर सकते हैं। वैज्ञानिको का कहना है कि जीवन की उत्पत्ति, एक बार नहीं होकर, कई बार कई स्थानों पर हुर्ह तथा वहाँ से जीवन हर दिशा में फैलता गया।

डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ के अनुसार हमारे सूर्य व पृथ्वी की उत्पत्ति एक नष्ट हुए तारे के मलवे से हुई होगी। उस तारे के किसी ग्रह पर जीवन उपस्थित था। तारे के नष्ट होने की प्रक्रिया में जब उस तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम हुई तो वह ग्रह उससे छिटक कर अलग हो गया। किसी कारणवश उस ग्रह का विघटन अणु स्तर तक नहीं हुआ। अणु स्तर तक विघटित होने से बचे उस ग्रह के मलबे का उपयोग पृथ्वी के निर्माण में हुआ होगा। स्पष्ट है कि पृथ्वी की उत्पति के साथ ही उस पर जीवन उपस्थित रहा होगा या पृथ्वी के बनने के कुछ करोड़ वर्ष में ही जीवन पृथ्वी पर आगया होगा।

उल्काओं में जैवघटकों की तलाश
जीवन के घटक बाहर अन्तरिक्ष से आने की बात की पुष्टि करने के लिए वैज्ञानिक आजकल पृथ्वी पर गिरी उल्काओं को एकत्रित कर उनका आधुनिक तकनीकी से विष्लेषण कर रहे है। उल्काओं का उपयोग पूर्व में भी किया जाता रहा है मगर उनके पृथ्वी के पदार्थो ये संक्रमित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता था। वर्तमान अनुसंधान में ऐसे नाभकीय क्षारक व उनसे मिलते जुलते अन्य अणु मिले है जो पृथ्वी के रसायन नहीं है। इससे इस बात का सहज अनुमान किया जा कसता है कि अन्तरिक्ष में जीवन के घटक प्रचुर मात्रा में उपस्थित हैं। कार्बनधनी अन्य उल्काओं का अध्ययन करने पर कोषिका के उपापचय चक्रों जैसे साइट्रिक अम्ल चक्र आदि के घटक भी पाए गए हैं। इस अनुसंधान से इस बात का भी संकेत मिलता है कि साइट्रिक अम्ल चक्र जीवन उत्पत्ति के प्रारम्भिक इतिहास में भी उपस्थित थे।

आॅक्सीकारी था पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल?
नए अनुसंधानों से प्रथम जीव की उत्पत्ति के इतिहास की खोज में एक रणनितिक बदलाव आया है। न्यूयार्क के खगोलजैविकी (Astrobiology) केन्द्र के वैज्ञानिकों ने प्राप्त प्राचीनतम खनिजों के आधार पर पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल का जो संघटनात्मक चित्र तैयार किया है वह प्रचलित धारणाओं से मेल नहीं खाता। अब तक यह माना जाता रहा है कि पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल में मिथेन, कार्बन मनो आक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया जैसी जीवन विरोधि गैसों का प्रभुत्व था। आॅक्सीजन की कमी के कारण पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल घोर अपचायक था। र्जिकोन्स के अध्ययन से प्राप्त जानकारी के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद मात्र 50 करोड़ वर्ष की अवधि में ही वर्तमान वायुमण्डल बन गया था। कुछ वैज्ञानिक इस सीमा तक तो आगे नहीं बढ़ते हैं मगर वे भी मानते है कि वायु मण्डल में आॅक्सीजन युक्त गैसों जैसे कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, जल वाष्प आदि का प्रभुत्व अवष्य था। यदि इस बात को स्वीकार किया जाता है तो जीव की प्रथम उत्पत्ति के विषय में अब तक दिए गए सिद्वान्तों को छोड़ना होगा क्योंकि वे अपचायक वायुमण्डल को ध्यान में रख कर दिए गए है। 

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न प्रकार के विचार प्रकट किए जाते रहे हैं मगर अभी किसी एक के पक्ष में आम सहमति नहीं बन पाई है। अभी तक ‘‘जितने मुँह उतनी बातें’’ जैसी स्थिति बनी हुई है। कुछ वैज्ञानिक जीव की उत्पत्ति को विशुद्ध प्राकृतिक संयोग मानते हैं तो ऐसे वैज्ञानिकों की भी कमी नहीं है जो जीवन की उत्पत्ति में ईश्वरीय योगदान की सम्भावना को नकारने के लिए तैयार नहीं है। अनुसंधानों का दौर अभी जारी है। बहुत सम्भव है कि जल्दी हमें किसी नए सिद्धान्त के प्रतिपादन की सूचना मिले। 
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लेखक परिचय:

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हिन्दी के चर्चित विज्ञान लेखक हैं। 25 वर्षों तक विज्ञान अध्यापन के बाद आप श्री बांगण राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। आपके विज्ञान विषयक आलेख वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त होते रहे हैं। साथ ही आपकी विज्ञान विषयक 10 पुस्तकें भी प्रकाशि‍त हो चुकी हैं, जिनमें एक बाल विज्ञान कथा संग्रह भी शामिल है। इसके अतिरिक्त विज्ञान लेखन के लिए आपको राजस्थान साहित्य अकादमी सहित अनेक संस्थाएं पुरस्कृत/सम्मानित भी कर चुकी हैं।

Monday, 4 January 2016

सौरमंडल के महत्त्वपूर्ण तथ्य

सौरमंडल के महत्त्वपूर्ण तथ्य
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सबसे बड़ा ग्रह --------------------बृहस्पति (Jupiter)
सबसे छोटा ग्रह -------------------बुध (Mercury)
पृथ्वी का उपग्रह -------------------चन्द्रमा (Moon)
सूर्य से सबसे निकट ग्रह ----------बुध (Mercury)
सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह ------वरूण (Neptune)
पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह ---------शुक्र (Venus)
सबसे अधिक चमकीला ग्रह ------- शुक्र (Venus)
सबसे अधिक चमकीला तारा ---- साइरस (Dog Star)
सबसे अधिक उपग्रहों वाला ग्रह ----बृहस्पति व शनि
सबसे अधिक ठण्डा ग्रह ----------वरूण (Neptune)
सबसे अधिक भारी ग्रह ---------- बृहस्पति (Jupiter)
रात्री में लाल दिखाई देने वाला ग्रह ----- मंगल (Mars)
सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह ---    गैनीमेड (Gannymede)
सौरमंडल का सबसे छोटा उपग्रह- डी मोस (Deimos)
नीला ग्रह ------------------------------ पृथ्वी (Earth)
भोर का तारा ------------------------शुक्र (Venus)
साँझ का तारा ------------------------ शुक्र (Venus)
पृथ्वी की बहन ------------------------ शुक्र (Venus)
सौन्दर्य का देवता ---------------------शुक्र (Venus)
हरा ग्रह ----------------------------- वरूण (Neptune)
विशाल लाल धब्बे वाला ग्रह ------ बृहस्पति (Jupiter)

Monday, 28 September 2015

मंगल को लेकर NASA का बड़ा खुलासा, स्पेस एजेंसी ने ग्रह पर पानी होने की पुष्टि की


वॉशिंगटन. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने मार्स एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम से जुड़ा बड़ा खुलासा किया है। नासा ने मंगल ग्रह पर पानी होने की पुष्टि की है। साइंटिस्ट्स का मानना है कि मंगल ग्रह पर देखी गई गहरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता है। नासा के सैटेलाइट से मिला डाटा से पता चलता है कि चोटियों पर दिखने वाले ये लक्षण नमक की मौजूदगी से जुड़े हैं। अहम बात है कि ऐसा नमक, पानी के जमने और भांप बनने के तापमान को भी बदल सकते हैं। इससे पानी ज्यादा समय तक बह सकता है। नासा के इस खुलासे से मंगल ग्रह पर जीवन होने की नई उम्मीद जगी है।


लुजेंद्र की बात पर लगी मुहर
मंगल पर पानी मिलने की संभावना इसलिए जोर पकड़ी थी, क्योंकि नासा ने इस अनाउंसमेंट में लुजेंद्र ओझा नाम के पीएचडी स्टूडेंट के शामिल होने की बात कही थी। 2011 में ग्रैजुएट कर चुके 21 वर्षीय लुजेंद्र ने मंगल पर पानी के संभावित लक्षण खोजे हैं। बता दें कि वैज्ञानिकों को मंगल के ध्रुवों पर जमे हुए पानी की जानकारी तो पहले से है, लेकिन इसे लिक्विड फॉर्म में खोजा जाना अभी बाकी है।
ओझा ने बताया था, भाग्यशाली दुर्घटना
एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ओझा को 'संयोगवश' पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है। प्लैनेट की सतह की तस्वीरों की स्टडी के बाद उन्हें इस बात के सबूत मिले थे। ओझा ने इस खोज को 'भाग्यशाली संयोग' बताते हुए कहा कि शुरुआत में उन्हें इसके बारे में समझ में नहीं आया। मंगल की सतह पर बने गड्ढों की कई साल तक स्टडी के बाद पता चला कि ये बहते पानी के कारण बने हैं।
 
40 साल पहले मिले थे पोल पर बर्फ के सबूत
मंगल पर पानी के सबूत मिलना कोई नई बात नहीं है। करीब चार दशक पहले इस प्लैनेट के पोल पर बर्फ की खोज की गई थी। इसके अलावा, ग्रह की सतह पर रगड़ के निशान इस ओर इशारा करते हैं कि लाखों साल पहले यहां समुद्र और नदियां रही होंगी। हालांकि, इस ग्रह पर कम ग्रैविटी और वहां के वायुमंडल के आधार पर माना जाता है कि ग्रह पर मौजूद पानी स्पेस में इवैपेरेट (वाष्पित) हो गया होगा। प्लैनेट पर लिक्विड पानी की यह पहली खोज है।

Saturday, 26 September 2015

What happen to your donated blood after blood donation?

Step 1: The Donation
1. Donor registers
2. Health history and mini physical are completed
3. About 1 pint of blood and several small test tubes are collected from each donor
4. The bag, test tubes and the donor record are labeled with an identical bar code label to keep track of the donation
5. The donation is stored in iced coolers until it is transported to a Red Cross center
Step 2: Processing
1. Donated blood is scanned into a computer database
2. Most blood is spun in centrifuges to separate the transfusable components – red cells, platelets, and plasma
3. The primary components like plasma, can be further manufactured into components such as cryoprecipitate
4. Red cells are then leuko-reduced
5. Single donor platelets are leukoreduced and bacterially tested.
6. Test tubes are sent for testing.
Step 3: Testing
1. Steps 2 and 3 take place in parallel
2. The test tubes are received in Red Cross National Testing Laboratories
3. A dozen tests are performed on each unit of donated blood – to establish the blood type and test for infectious diseases
4. Test results are transferred electronically to the manufacturing facility within 24 hours
5. If a test result is positive, the unit is discarded and the donor is notified. Test results are confidential and are only shared with the donor, except as may be required by law
Step 4: Storage
1. When test results are received, units suitable for transfusion are labeled and stored
2. Red Cells are stored in refrigerators at 6ºC for up to 42 days
3. Platelets are stored at room temperature in agitators for up to five days
4. Plasma and cryo are frozen and stored in freezers for up to one year
Step 5: Distribution
Blood is available to be shipped to hospitals 24 hours a day, 7 days a week.

Source:-http://m.redcrossblood.org/learn-about-blood/what-happens-donated-blood

Wednesday, 12 August 2015

How the Human Eye Works?

The human eye has been called the most complex organ in our body. It's amazing that something so small can have so many working parts.

Parts of the Eye

Aqueous Humour
The aqueous humour is a jelly-like substance located in the anterior chamber of the eye.

Choroid
The choroid layer is located behind the retina and absorbs unused radiation.

Ciliary Muscle
The ciliary muscle is a ring-shaped muscle attached to the iris. It is important because contraction and relaxation of the ciliary muscle controls the shape of the lens.

Cornea
The cornea is a strong clear bulge located at the front of the eye (where it replaces the sclera - that forms the outside surface of the rest of the eye). The front surface of the adult cornea has a radius of approximately 8mm. The cornea contributes to the image-forming process by refracting light entering the eye.

Fovea
The fovea is a small depression (approx. 1.5 mm in diameter) in the retina. This is the part of the retina in which high-resolution vision of fine detail is possible.

Hyaloid
The hyaloid diaphragm divides the aqueous humour from the vitreous humour.

Iris
The iris is a diaphragm of variable size whose function is to adjust the size of the pupil to regulate the amount of light admitted into the eye. The iris is the coloured part of the eye (illustrated in blue above but in nature may be any of many shades of blue, green, brown, hazel, or grey).

Lens
The lens of the eye is a flexible unit that consists of layers of tissue enclosed in a tough capsule. It is suspended from the ciliary muscles by the zonule fibers.

Optic Nerve
The optic nerve is the second cranial nerve and is responsible for vision. Each nerve contains approx. one million fibres transmitting information from the rod and cone cells of the retina.

Papilla
The papilla is also known as the "blind spot" and is located at the position from which the optic nerve leaves the retina.

Pupil
The pupil is the aperture through which light - and hence the images we "see" and "perceive" - enters the eye. This is formed by the iris. As the size of the iris increases (or decreases) the size of the pupil decreases (or increases) correspondingly.

Retina
The retina may be described as the "screen" on which an image is formed by light that has passed into the eye via the cornea, aqueous humour, pupil, lens, then the hyaloid and finally the vitreous humour before reaching the retina.
The retina contains photosensitive elements (called rods and cones) that convert the light they detect into nerve impulses that are then sent onto the brain along the optic nerve.

Sclera
The sclera is a tough white sheath around the outside of the eye-ball.
This is the part of the eye that is referred to by the colloquial terms "white of the eye".

Visual Axis
A simple definition of the "visual axis" is "a straight line that passes through both the centre of the pupil and the centre of the fovea". However, there is also a stricter definition (in terms of nodal points) which is important for specialists in optics and related subjects.

Vitreous Humour
The vitreous humour (also known as the "vitreous body") is a jelly-like substance.

Zonules
The zonules (or "zonule fibers") attach the lens to the ciliary muscles.

How the Human Eye Works
In a number of ways, the human eye works much like a digital camera:

Light is focused primarily by the cornea — the clear front surface of the eye, which acts like a camera lens.

The iris of the eye functions like the diaphragm of a camera, controlling the amount of light reaching the back of the eye by automatically adjusting the size of the pupil (aperture).

The eye's crystalline lens is located directly behind the pupil and further focuses light. Through a process called accommodation, this lens helps the eye automatically focus on near and approaching objects, like an autofocus camera lens.

Light focused by the cornea and crystalline lens (and limited by the iris and pupil) then reaches the retina — the light-sensitive inner lining of the back of the eye. The retina acts like an electronic image sensor of a digital camera, converting optical images into electronic signals. The optic nerve then transmits these signals to the visual cortex — the part of the brain that controls our sense of sight.

Saturday, 8 August 2015

Cholesterol?

What Is Cholesterol?

Cholesterol is not the same as fat. If you had a bit of cholesterol on the end of your finger, it would look like wax. The liver manufactures cholesterol and sends it out to other parts of the body for the production of hormones and cell membranes. Based on the results of the Framingham Heart Study and other research, the ideal cholesterol level is below 150 mg/dl.

Different Types of Cholesterol

When cholesterol is transported in the bloodstream, it is packed into low-density lipoproteins (LDL), sometimes called the “bad cholesterol” and high density lipoproteins (HDL) sometimes called the "good cholesterol" Although LDL is necessary in limited quantities (LDL delivers cholesterol to various parts of the body), a high LDL cholesterol level can dramatically increase your risk of a heart attack.

How to Lower Your Cholesterol

People can reduce their cholesterol levels dramatically by changing the foods they eat.
Decrease Cholesterol Intake Since our bodies make plenty of cholesterol for our needs, we do not need to add any in our diet. Cholesterol is found in all foods that come from animals: red meat, poultry, fish, chicken, eggs, milk, cheese, yogurt, and other dairy products. All animal products should be avoided for this reason.

No foods from plants contain cholesterol, since plants do not have a liver to produce it.

Decrease Fat Intake, Especially Saturated Fats Keeping total fat intake low is an important way to lower cholesterol and reduce the risk of other chronic diseases.

Animal products also contain saturated fat, which causes the liver to produce more cholesterol.