Saturday, 7 May 2016

Difference between mass and weight.


Mass is the measure of the amount of matter in a body. Mass is denoted using m or M.

Weight is the measure of the amount of force acting on a mass due to the acceleration due to gravity. Weight usually is denoted by W. Weight is mass multiplied by the acceleration of gravity.

Comparison of Mass and Weight

1)- Mass is a property of matter. The mass of an object is the same everywhere,
   - Weight depends on the effect of gravity. Weight varies according to location.

2)- Mass can never be zero.
    -Weight can be zero if no gravity acts upon an object, as at the center of earth(g = 0).

3)- Mass does not change according to location.
   - Weight increases or decreases with higher or lower gravity.

4)- Mass is a scalar quantity. It has magnitude.
   - Weight is a vector quantity. It has magnitude and is directed toward the center of the Earth or other gravity well.

5)- Mass may be measured using an ordinary balance.
   - Weight is measured using a spring balance.

6)- Mass usually is measured in grams and kilograms.
    - Weight often is measured in newtons, a unit of force.

Sunday, 10 April 2016

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?

विज्ञान के अब तक के सभी प्रयासों के बावजूद पृथ्वी के बाहर किसी स्थान पर जीवन होने की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है। पृथ्वी पर एक कोषिकीय, बहुकोशिकीय, कवक, पादप, जन्तु आदि लाखों प्रकार के जीव पाए जाते हैं मगर वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि इन सब का प्रथम पूर्वज एक ही था। आज भी इस प्रश्न का उत्तर जानना शेष है कि सभी जीवों का प्रथम पूर्वज पृथ्वी पर ही जन्मा था या किसी अन्य खगोलीय पिण्ड से पृथ्वी पर आया? प्रथम जीव की उपपत्ति में ईश्वर जैसी किसी शक्ति की कोई भूमिका रही है या यह मात्र प्राकृतिक संयोग की देन है? प्रथम जीव के अजीवातजनन को समझाने वाले ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों को भी जोरदार चुनौति दी जा रही है।
लगभग सभी धर्मों में विशि‍ष्ट सृजन की बात कही गई है। इस मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों को ईश्वर ने ठीक वैसा ही बनाया जैसे वे वर्तमान मे पाए जाते हैं। मनुष्य को सबसे बाद में बनाया गया। इस मान्यता में विश्वास करने वाले इसाई धर्म गुरु आर्चबिशप उशर (Archbishop Ussher) ने सन् 1650 में अपनी गणना के आधार पर बताया था कि ईश्वर ने विश्व सृजन का कार्य 01 अक्टोबर 4004 ईसापूर्व को प्रारम्भ कर 23 अक्टोबर 4004 ईसा पूर्व को पूरा किया। इस मान्यता के पक्ष में किसी प्रकार के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
अपने अवलोकनों के आधार पर अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने निर्जीव पदार्थों से जीवों की उपपत्ति को समझाने का प्रयास किया। इस मान्यता के अनुसार प्रकृति में निर्जीव पदार्थों जैसे कीचड़ से मेढ़क, सड़ते मांस से मक्खियां आदि सजीवों की उत्पत्ति होती रहती है। वान हेल्मोन्ट (Van Helmont) जैसे वैज्ञानिक ने प्रयोग द्वारा पुराने कपड़ों व अनाज द्वारा चूहे जैसे जीव पैदा होने की बात प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का प्रयास भी किया था। निर्जीव पदार्थों से सजीव उत्पन्न होने की मान्यता उन्नीसवीं शताब्दि में तक चलती रही जबतक लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों के बल पर निर्विवाद रूप से इसका अन्त नहीं कर दिया। आज सभी यह जानते है कि कोई भी जीव पहले से उपस्थित अपने जैसे जीव से ही उत्पन्न हो सकता है मगर यह प्रष्न अभी भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहला जीव कहाँ से आया?
प्रथम जीव का अजैविक जनन
जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकार कर प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीव की उत्पत्ति की सर्वप्रथम विवेचना करने का श्रेय चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) को जाता है। अपनी पुस्तक आॅरिजन आॅफ स्पेसीज (Origin of Species) में पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों की उत्पत्ति को जैवविकास के सिद्धान्त से समझाते हुए चार्ल्सडार्विन, चर्च के डर से, ईश्वर की भूमिका को पूरी तरह नकार नहीं सके थे। अपनी इच्छा के विपरीत डार्विन को यह बहना पड़ा कि ईश्वर ने सभी जीवों को अलग अलग नहीं बना कर एक सरल जीव बनाया तथा वर्तमान सभी जीवों की उत्पत्ति उस एक पूर्वज से, जैव विकास की विधि द्वारा हुई है। अपने मित्रों तथा अन्य जिज्ञासुओं से डार्विन ने अपने विचार की असलियत को नहीं छुपाया। 
डार्विन ने जीव की उपपत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकारते हुए कहा था कि प्रथम जीव की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई। 01 फरवरी 1871 को उत्पत्ति को लिखे पत्र में चार्ल्स डार्विन ने संभावना प्रकट कि अमोनिया, फास्फोरस आदि लवण घुले गर्म पानी के किसी गढ्ढे में, प्रकाश, उष्मा, विद्युत आदि के प्रभाव से, निर्जीव पदार्थां से पहले जीव की उत्पत्ति हुई होगी।
रुसी वैज्ञानिक अलेक्जेण्डर इवानोविच ओपेरिन(Alexander Ivanovich Oparin) ने 1924 में जीव की उत्पत्ति नाम से निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का सर्व प्रथम सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। ओपेरिन ने कहा कि लुई पाश्चर का यह कथन सच है कि जीव की उत्पत्ति जीव से ही होती है मगर प्रथम जीव पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता। प्रथम जीव की उत्पत्तितो निर्जीव पदार्थों से ही हुई होगी। ओपेरिन ने कहा कि सजीव व र्निजीव में कोई मूलभूत अन्तर नहीं होता। रसायनिक पदार्थों के जटिल संयोजन से ही जीवन का विकास हुआ है। विभिन्न खगोलीय पिण्डों पर मिथेन की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल मिथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जल वाष्प से बना होने के कारण अत्यन्त अपचायक रहा होगा। इन तत्वों के संयोग से बने योगिकों ने आगे संयोग कर और जटिल योगिकों का निर्माण किया होगा। इन जटिल योगिकों के विभिन्न विन्यासों के फलस्वरूप उत्पन्न नए गुणों ने जीवन की नियमितता की नींव रखी होगी। एक बार प्रारम्भ हुए जैविक लक्षण ने स्पर्धा व संघर्ष के मार्ग पर चलकर वर्तमान सजीव सृष्टि का निर्माण किया होगा। 
अपने सिद्धान्त के पक्ष में ओपेरिन ने, कुछ कार्बनिक पदार्थों के व्यवस्थित होकर कोश‍िका के सूक्ष्म तन्त्रों में बदलने उदाहरण दिए। बाद में डच वैज्ञानिक जोंग के द्वारा किए गए प्रयोगों में बहुत से कार्बनिक अणुओं के आपस में जुड़ कर विलयन से भरे पात्र जैसी सूक्ष्म रचनाओं के बनने से ओपेरिन के सिद्धान्त को बल मिला। कार्बनिक अणुओं की पर्त से बने सूक्ष्म पात्रों को ही डी जुंग ने कोअसरवेट नाम दिया था। कोअसरवेट द्वारा परासरण जैसी क्रियाओं के प्रर्दशन के कारण इन्हें उपापचय क्रियाओं का आधार मानते हुए जीवन के प्रथम के घटक के रूप में देखा गया। ओपेरिन का मानना था कि आद्य समुद्र में अनेकानेक कोअसरवेट बने होगे तथा उनके जटिल संयोजन से ही अचानक प्रथम जीव की उत्पत्ति हुई होगी। 
1929 में जे.बी.एस. हाल्डेन (JBS Halden) ने ओपेरिन के विचारों को ओर विस्तार दिया। हाल्डेन ने पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर सुकेन्द्रकीय कोषिका की उत्पत्ति तक की घटनाओं को आठ चरणों में बांट कर समझाया। हाल्डेन ने कहा कि सूर्य से अलग होकर पृथ्वी धीरे धीरे ठण्डी हुई तो उस पर कई प्रकार के तत्व बन गए। भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र की ओर गए तथा हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन आर्गन से प्रारम्भिक वायुमण्डल बना। वायुमण्डल के इन तत्वों के आपसी संयोग से अमोनिया व जलवाष्प बने। इस क्रिया में पूरी आॅक्सीजन काम आजाने के कारण वायुमण्डल अपचायक हो गया था। सूर्य के प्रकाश व विद्युत विसर्जन के प्रभाव से रसायनिक क्रियाओं का दौर चलता रहा और कालान्तर में अमीनो अम्ल, शर्करा, ग्लिसरोल आदि अनेकानेक प्रकार के यौगिक बनते गए। इन यौगिको के जल में विलेय होने से पृथ्वी पर पूर्वजीवी गर्म सूप बना। 
सूप का घनत्व बढ़ता गया तथा उसमें कोलायडी कण बनने लगे। जल की सतह पर तैरते इन कणों ने आपस में जुड़कर झिल्ली का रूप लिया होगा। इस झिल्ली ने बाद में सू़क्ष्म पात्रों का निर्माण कर लिया जिन्हे कोसरवेट नाम दिया था। इस प्रकार जीवनपूर्व रचनाओं का उदय हुआ होगा। एन्जाइम जैसे उत्प्रेरकों के प्रभाव के कारण कोसरवेट में भरे रसायनों में संश्लेषण विश्लेषण जैसी क्रियाएं होने लगी होगी। धीरे धीरे अवायु श्वसन होने लगा। कोअसरवेट में कोई रसायन कम होता तो बाह्य वातावरण से अवषोषण कर उसकी पूर्ती करली जाती। चिपचिपेपन के कारण कोअसरवेट का आकार बढ़ता रहता तथा अधिकतम आकार होजाने पर वह स्वतः विभाजित होजाता था। बाद में नाभकीय अम्लों के रूप में कार्बनिक नियन्त्रक-तन्त्र विकसित हुए जो वृद्धि व जनन जैसी जैविक क्रियाओं को नियन्त्रित करने लगे। प्रारम्भिक कोषिका परपोषी प्रकार की रही होगी। बाद में पर्णहरित यौगिक तथा हरितलवक कोषिकांग के कोषिका में प्रवेष करने से पहली स्वपोषित कोषिका बनी होगी। प्रकाष संष्लेषण की क्रिया के प्रारम्भ होने पर जल का विघटन होने लगा जिससे आक्सीजन उत्पन्न होने लगी। वायुमण्डल में आॅक्सीजन की मात्रा साम्य स्थापित होने तक बढती रही होगी।

स्टेनले मिलर का प्रयोग
ओपेरिन तथा हाल्डेन की कल्पनाओं का कोई प्रयोगिक आधार नहीं था। 1953 में स्टेनले मिलर (Stanley Miller) ने ‘‘प्रारम्भिक पृथ्वी अवस्था में अमीनो अम्लों का उत्पादन संभव’’ लेख प्रकाषित कर ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों का समर्थन किया। स्टेनले मिलर ने अपने गुरु हारोल्ड यूरे के निर्देषन में एक बहुत ही अच्छे प्रयोग की योजना तैयार कर उसे क्रियान्वित किया था। मिलर ने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर यह देखना चाहता था कि क्या ओपेरिन ने जो कहा वैसा होना सम्भव है? 

मिलर ने प्रयोग करने के लिए एक विद्युत विसर्जन उपकरण बनाया। उपकरण में एक गोल पेंदे का फ्लास्क, एक विद्युत विसर्जन बल्ब तथा एक संघनक लगा था। गोल पेंदे के फ्लास्क में पानी भरने के बाद उपकरण में हवा निकाल कर उसमें मिथेन, अमोनिया व हाइड्रोजन को 2:1:2 अनुपात में भर दिया गया। विद्युत विसर्जन के साथ साथ पानी को उबलने दिया जाता तो उत्पन्न भाप के प्रभाव के कारण गैसे निरन्तर वृत में घूमती रहती। विद्युत विर्सजन बल्ब से निकलने वाली जलवाष्प के संघनित होने पर उसे विष्लेषण हेतु बाहर निकाला जा सकता था। मिलर ने निरन्तर एक सप्ताह विद्युत विर्सजन होने के बाद संघनित द्रव का विष्लेषण किया। विश्लेषण करने पर उस द्रव में अमीनो अम्ल, एसिटिक अम्ल आदि कई प्रकार के कार्बनिक पदार्थ उपस्थित पाए गए। 

मिलर के प्रयोग द्वारा ओपेरिन के रसानिक विकास की परिकल्पना की पुष्टि होने से इस सिद्धान्त की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। मिलर के प्रयोग के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि शनि के उपग्रह टाइटन के वायुमण्डल में जीव की उत्पत्ति की संभावना की पड़ताल के सन्दर्भ में इस प्रयोग को पुनः दोहराया गया है। प्रयोग से प्राप्त आकड़ों के आधार पर कहा जाने लगा है कि जल की अनुस्थिति में भी वायुमण्डल में जीवन के घटकों का संश्लेषण संभव है।

मिलर के प्रयोग से पृथ्वी के प्रारम्भिक वातावरण में कार्बनिक अणुओं के बनने की बात तो समझ में आगई थी मगर अब प्रश्न यह था कि इन एकल अणुओं ने आपस में जुड़ कर बहुलक अणुओं का निर्माण किस प्रकार किया होगा? 1950 से 1960 के मध्य सिडनी फोक्स (Sidney Fox) ने कुछ प्रयोग किए जिनमें यह पाया गया कि पृथ्वी के प्रारम्भिक समय में अमीनो अम्ल स्वतः ही पेप्टाइड बंधों से जुड़ कर पोलीपेप्टाइड बनाने में सफल रहे होंगे। ये अमीनो अम्ल तथा पोलीपेप्टाइड जुड़ कर गोलाकार झिल्ली व प्रोटीनाॅइड माइक्रोस्फेयर में व्यवस्थित होसकते थे जैसा कि प्रारम्भिक जीवन रहा होगा।

मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है जीवन
जीवन मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है। जीवन के विषय में ज्यों ज्यों जानकारी बढ़ती जा रही है प्रथम जीव की उत्पत्ति को समझाना उतना ही कठिन होता रहा है। जीवन की संरचना व उसकी कार्य प्रणाली को 1992 में हारोल्ड होरोविट्ज(Harold Horowitz) ने निम्न बिन्दुओं में समझाया- 

1. जीव कोश‍िका से बना होता है।
2. प्रत्येक कोश‍िका का 50 से 90 प्रतिषत भाग जल का बना होता है। जल ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में हाइड्रोजन, प्रोटोन तथा आक्सीजन की आपूर्ति करता है तथा जैव अणुओं के लिए विलायक की भूमिका निभता है। 

3. जीवन के निमार्ण में प्रयुक्त अधिकांश सहसंयोजक जैव-अणु कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन, फास्फोरस तथा गंधक से बने होते हैं। 

4. जैव-अणुओं जैसे शर्करा, अमीनोअम्ल, न्यूक्लियोटाइड, वसीयअम्ल, फोस्फोलिपिड, विटामिन तथा सहएन्जाइम आदि से बना एक छोटा समूह ही सम्पूर्ण सजीव सृष्टि का निर्माता है। 

5. प्रत्येक जीव के गठन में प्रमुख भाग बड़े अणुओं प्रोटीन, लिपिड, कार्बोहाइड्रेट व नाभकीय अम्ल का होता है।
6. सभी जीवों की कोषिकाओं में एक ही प्रकार की दोहरी लिपिड झिल्ली पाई जाती है। 

7.सभी जीवों में ऊर्जा का प्रवाह फास्फेट बंध (एटीपी) के जल अपघटन के माध्यम से होता है।

8.सम्पूर्ण सजीव जगत में उपापचय क्रियाएं एक छोटे समूह-ग्लाइकोलाइसिस, क्रेब्स चक्र, इलेक्ट्रोन स्थानान्तरण श्रंखला के माध्यम से सम्पन्न होती है।

9. विभाजित होने वाली प्रत्येक कोषिका में डीएनए का एक सेट जिनोम के रूप में होता है। यह आरएनए के रूप में सूचना निर्देष भेजता है जिसका अनुवाद प्रोटीन के रूप में होता है।

10. वृद्धि करती प्रत्येक कोषिका में राइबोसोम पाए जाते हैं जो प्रोटीन संष्लेषण करते हैं।

11. प्रत्येक जीन सूचनाओं का अनुवाद न्यूक्लियोटाइड भाषा से विषिष्ट एन्जाइम के सक्रियण व ट्रान्सफर आरएनए के रूप में करता है।

12. जनन करने वाला प्रत्येक जीव, उसके जीनोटाइप में उत्परिवर्तन के कारण, स्वयं से कुछ भिन्न सन्तानें उत्पन्न करता है।

13. सभी जीवित कोषिकाओं में पर्याप्त तीव्र गति से होने वाली रसायनिक क्रियाएं एन्जाइमों से उत्प्रेरित होती हैं। 
जीवन की उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट है कि जीवन कार्बनिक अणुओं या उनके बहुलकों का विषिष्ट समूह मात्र नहीं है। जीवन में कोश‍िका झिल्ली, उपापचय क्रियाएं, जिनोम, एन्जाइम आदि अनेक तन्त्र अद्भुत सन्तुलन के साथ क्रियाशील रहते हैं। किसी की भी अनुपस्थिति में जीवन की कल्पना नहीं की जाकती। जीवन के विकास की बात करने पर यह तो सम्भव नहीं हैं कि प्रकृति में ये सभी तन्त्र एक साथ विकसित होकर साथ काम करने लगे होंगे। यदि इनका विकास अलग अलग हुआ तो कौन पहले और कौन बाद में बना। यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण कि किसी तन्त्र विषेष के बनने तक शेष तन्त्रों का कार्य कैसे चला होगा? यह कोई एक प्रश्न नहीं अपितु प्रश्नों का समुच्चय है जिनका जबाव खोजना चुनौति भरा कार्य है। वैज्ञानिक इस अनबुझ पहेली से खबराए नहीं हैं। हजारों वैज्ञानिक अनवरत रूप से इन प्रष्नों के हल तलाशने में लगे हैं। यहाँ हम कुछ प्रमुख प्रयासों की चर्चा करेंगे।

उष्णजलीय रन्ध्र (हाइड्रोथर्मल वेन्ट) सिद्धान्त
लम्बे समय से चले आ रहे ओपेरिन व हाल्डेन के विचार को उस समय गहरा धक्का लगा जब कई युवा वैज्ञानिकों ने इस बात से असहमति जताई कि आद्यसूप में जन्मे प्रथम जीव ने अपनी ऊर्जीय आवश्कताओं की पूर्ती अवायु श्वशन द्वारा की होगी। उनका कहना है कि ओपेरिन व हाल्डेन के विचार जैव-और्जिकी व उष्मागतिक सिद्वान्तों के अनुरूप नहीं है। 

प्रोफेसर विलियम मार्टिन (Professor William Martin) के निर्देशन में भूरसायनिज्ञ माइकील रुस्सेल (Michael Russell) ने जीव की प्रथम उत्पत्ति का वैकल्पिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उष्णजलीय रन्घ्र सिद्धान्त नाम के इस सिद्धान्त में कहा गया कि जीव उत्पत्ति आद्यसूप में नहीं होकर समुद्र के पेंदे पर धात्विक लवणों से निर्मित चट्टानों पर बने सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों में हुई होगी। जल में विलेय हाइड्रोजन, कार्बन डाय आक्साइड, नाइट्रोजन व हाइड्रोजन सल्फाइड गैसों ने इन रध्रों में प्रवेश कर विभिन्न प्रकार के कार्बनिक योगिको को जन्म दिया होगा। सूक्ष्म दूरी पर स्थित इन रंध्रों के मध्य ठीक वैसी ही रसायनिक प्रवणता स्थापित हुई होगी जैसी वर्तमान कोषिका में उत्पन्न होती है। प्रारम्भिक जीव ने रसायनिक-परासरण के माध्यम से रसायनिक प्रवणता का उपयोग कर ऊर्जा की वैष्विक मुद्रा एटीपी या उसके समकक्ष किसी अन्य का उपयोग किया होगा। 

इस प्रकार प्रारम्भिक जीवन अपनी ऊर्जा आवष्यकताओं की पूर्ती हेतु धरती माँ पर निर्भर रहा होगा। कालान्तर में जीवन ने अपना स्वयं का प्रोटोन प्रवणता तन्त्र विकसित कर इलेक्ट्रोन का स्थानान्तरण करना सीख लिया होगा। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों का मानना है कि हाइड्रोजन ने प्रथम इलेक्ट्रोन दाता तथा कार्बन डाय आक्साइड ने प्रथम ग्राहाता की भूमिका निभाई होगी। अपना ऊर्जा उत्पादन तन्त्र विकसित करने के बाद जीवन सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों से बाहर स्वतन्त्र जीवन जीने लगा होगा। आज सभी जीव रसायनिक परासरणी है, प्रथम जीव भी ऐसा ही रहा होगा।

आर.एन.ए. विश्व
वर्तमान जीवन पूर्णतः डी.एन.ए. आधारित है। डीएनए में संग्रहित सूचना को केन्द्रक के बाहर कोश‍िका द्रव्य में आरएनए लेजाता है। कोश‍िका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम डीएनए से प्राप्त सूचना के अनुरूप प्रोटीन (एन्जाइम) का संष्लेषण करते है। प्रोटीन के उत्प्रेरण से ही जीवन की सभी क्रियाएं निर्देश‍ित होती है। कोषिका में सभी प्रकार के निर्माण होते हैं। डीएनए के संश्लेषण में कई प्रकार के प्रोटीन (एन्जाइम) की भूमिका होती है। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जीवन विकास के क्रम में पहले डीएनए आया या प्रोटीन? 

बहुत सम्भव है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में डीएनए नहीं था। आरएनए अपनी भूमिका के साथ डीएनए व प्रोटीन की भूमिका भी अभिनीत किया करता होगा। 1983 में थोमस केचतथा सिडनी अल्टान (Sidney Altman) ने स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए राइबोजाइम की खोज की। इन वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि आरएनए को अपने निर्माण व परिवर्तन में किसी प्रोटीन की आवश्यकता नहीं होती। प्रोटीन की तरह कार्य कर सकने वाले आरएनए को ही राइबोजाइम नाम दिया गया। इस परिकल्पना के अनुसार एक समय ऐसा था जब अणु जगत का सुप्रिमो आरएनए ही था। उस काल को आरएनए विष्व के नाम से जाना जाता है। आरएनए विष्व की अवधारणा विकसित करने पर थोमस केच तथा सिडनी अल्टान को नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाद में डीएनए ने आरएनए की कई भूमिकाओं को उससे छीन लिया। आरएनए के द्विगुणन तथा स्पालसिंग में राइबोजाइम आज भी सक्रिय है। 

यह प्रश्न विचारणीय है कि आरएनए संष्लेषण की क्रिया प्रणाली भी इतनी सरल तो नहीं कि जीवन के प्रारम्भ से ही इसकी भूमिका को स्वीकार लिया जाय? 2009 में जोहन सुथरलैण्ड(John Sutherland) ने जीवन पूर्व परिस्थितियों में आकस्मिक रूप से पायरीमीडीन न्यूक्लियोटाइड एकलक श्रंखला का संश्लेषण संभव बता कर आरएनए विश्व की संभावना को बल प्रदान किया है। प्यूरीन न्यूक्लियोंटादड एकलक श्रंखला का संश्लेषण की संभावना का प्रतिपादन अभी नहीं हुआ है।

समहस्तता का विकास
अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि असममित कार्बन यौगिक होते हैं और प्रकाश समावयता का गुण प्रदर्शित करते हैं। इनके अणु प्रतिबिम्ब आकृति लिए दो रूप के होते हैं। एक रूप समध्रुवी प्रकाश को बांई और तो दूसरा रूप समध्रुवी प्रकाश को दांई रूप घूमाने का गुण रखता है। पहले प्रकार के अणुओं को वास्तहस्त तथा दूसरे को दक्षिणहस्त रूप अणु कहते हैं। प्रयोगशाला में इनका निर्माण करने पर दोनों रूप साथ साथ व समान मात्रा में बनते हैं। एक अनुपात एक के इस रैसेमिक मिश्रण का समध्रुवित प्रकाश पर कोई असर नहीं होता। 

आश्चर्य की बात है कि जीवन की संरचना में लगे असममित अणु जैसे अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि समहस्तता का प्रदर्षन करते हैं। केवल वामहस्ती अमीनो अम्ल ही प्रोटीन बनाने व दक्षिण हस्ती शर्करा नाभकीय अम्लों के निर्माण में उपयोगी होती है। अध्ययन से पता चलता है कि समहस्तता जीवन की अनिवार्यता है। कई दषकों से अनुसंधानकर्ता इस चमत्कार का जबाव खोजते रहे हैं कि समहस्तता व जीवन का साथ कब से व किस कारण से हुआ?

अभी हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों से इस बात का पता चला है कि जीवन के साथ समहस्तता का जुड़ाव कोई चमत्कार नहीं होकर एक प्राकृतिक घटना है। इस विषय में पहला प्रमाणमुरकीशन उल्का के अध्ययन से प्राप्त हुआ है। मुरकीशन उल्का का नामकरण आॅस्ट्रेलिया के उस स्थान के नाम कर किया गया है जहाँ 28 सितम्बर 1969 को यह उल्कापात हुआ था। इस उल्का का रसायनिक विश्लेषण करने पर अन्य पदार्थों के साथ इसमें कई प्रकार के अमीनोअम्ल भी पाए गए। इनमें कुछ अमीनो अम्ल वे थे जो पृथ्वी के जीवों के प्रोटीन में पाए जाते हैं तो कई ऐसे अमीनो अम्ल भी थे जो प्रोटीन बनाने में काम नहीं आते हैं। 

हमारे रुचि कि बात यह है कि मुरकीशन उल्का में पाए गए कई अमीनों अम्लों के वाम व दक्षिण हस्त रूप बराबर अनुपात में नहीं थे। ग्लेविन तथा डोरकिन ने एक अध्ययन में वामहस्ती आइसोवेलीन की मात्रा उसके दक्षिणहस्ती रूप से 18 प्रतिशत अधिक पाई। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि समहस्तता के गुण का विकास किसी उत्प्रेरक क्रिया के कारण प्रकृति में उत्पन्न हुआ है। बाद के अध्ययनों में पाया गया कि कई प्रकार के धात्विक क्रिस्टल के प्रभाव से या अन्य किसी रसायन के प्रभाव से वामहस्त या दक्षिण रूप अणुओं का अनुपात बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमीनो अम्लों में समहस्तता जीवनपूर्व काल में स्थापित होगई होगी तथा बाद में एन्जाइम के रूप में इसका प्रभाव र्शकरा पर हुआ होगा। आगे के अनुसंधान इस बात को और स्पष्ट कर सकेंगे।

पहले विकसित हुए उपापचय तन्त्र
जीवन की जटिलता को देखते हुए कई वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति से पूर्व कई उपापचय चक्रों का स्वतन्त्र रूप से विकास हो चुका होगा तथा बाद में जीवन ने उनका उपयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु किया होगा। वर्तमान मे उपापचय तन्त्रों का नियन्त्रण-निर्देशन एन्जाइमों के माध्यम से आनुवंषिक अणुओं द्वारा होता है। हम पूर्व में भी चर्चा कर चुके हैं कि आनुवंषिक पदार्थ डीएनए तथा आरएनए के संष्लेषण में उपाचय-तन्त्रों की भूमिका होती है। उपापचय तन्त्र के पहले विकसित होने की परिकल्पना में कहा गया है कि आरएनए विश्व के विकास से पूर्व न्यूक्लियोंटाइडों, ओलिगोन्यूक्लियोटाइडों आदि का संश्लेषण संभव हुआ होगा। 

उष्णजल रन्ध्रों में जीवन की उत्पत्ति के समय समुद्र के तले में चट्टानों की सतह पर उपापचय चक्रों का विकास हुआ होगा। कार्बन डाइ आक्साइड व जल के अणुओं के आकस्मिक संयोग से एसीटेट जैसा दो कार्बन परमाणु युक्त अणु बना होगा। इसके बाद खनिज लवणों व चट्टान सतह पर उपस्थित रन्ध्रों के उत्प्रेरकीय प्रभाव के कारण सरल कार्बनिक अणुओं के संष्लेषण के विभिन्न परिपथों का सूत्रपात हुआ होगा। प्रारम्भ में सरल अमीनों अम्ल व लिपिड अणुओं का संष्लेषण हुआ होगा व कालान्तर में सरल कार्बनिक यौगिकों के उत्प्रेरण प्रभाव से जटिल कार्बनिक अणु बनने लगे होंगे। 

इनमें कुछ सरल पेप्टाइड भी रहे होंगे। पेप्टाइडों के बनने से उत्प्रेरण की क्रिया और तेज हुई होगी जिसके परिणाम स्वरूप जटिल अमीनोअम्ल तथा न्यूक्लियोटाइड अणु अस्तित्व में आए होंगे। समहस्तता व आरएनए विष्व के विकास में इन उपापचय परिपथों की भूमिका रही होगी। जेम्स ट्रेफिल, हारोल्ड मारोविट्ज तथा इरिक स्मिथ ने अपने प्रयोगों के माध्यम से बताया कि अपचायक साइट्रिक अम्ल चक्र वर्तमान कोशि‍का में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक अणुओं के संश्लेषण में समर्थ है। साइट्रिक अम्ल चक्र को अभी तक ऊर्जा उत्पादक परिपथ के रूप ही देखा जाता रहा है। कोशि‍का की संरचना में इसकी भूमिका को पहली बार स्वीकार किया गया है।

सूर्य से पुराना है पृथ्वी पर जीवन
प्रथम जीव पृथ्वी पर नहीं जन्मा अपितु सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में अन्तरिक्ष के किसी जीव धारी पिण्ड से आया है यह परिकल्पना जीव विज्ञान के इतिहास में बहुत पुरानी है। लार्ड केल्विन (Lord Kelvin), वोन होलमहोल्ट्ज (Von Helmholtz) आदि ने उन्नीसवी शताब्दि में इस बात को प्रतिपादित किया था। फ्रेड हाॅयल (Fred Hoyle),विक्रमसिंघे (vikram singhe), जयन्त विष्णु नार्लीकर(Jayant Vishnu Narlikar) आदि ने बीसवीं शताब्दी में इसी बात को नए तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया फिर भी आद्यसूप-परिकल्पना के मुकाबले यह विचार अधिक वजन ग्रहण नहीं कर पाया। अब स्थितियाँ बदलने लगी हैं। अनुसंधान के नए उपकरणों के विकास के बाद अब ऐसे तथ्य जुटने लगे हैं जिनके के आधार पर वैज्ञानिक अब मजबूती के साथ कह रहे हैं कि प्रथम जीव की उत्पत्ति पृथ्वी पर नहीं हुई थी। पृथ्वी पर पहला जीव बाहर से आया था।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के पक्ष में अब तब जुटाए सभी तथ्यों को नकारते हुए इन वैज्ञानिकों का कहना है कि रसायनिक पदार्थों के आकस्मिक संयोग से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात करना ठीक वैसा ही है जैसा मंगल ग्रह पर कम्पयूटर मिलने पर कोई यह दावा करे कि इस कम्प्यूटर का रेण्डम संयोजन मिथेन कुण्ड में हुआ है। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों से अबतक जुटाए तथ्यों का गहन अध्ययन करने के बाद डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ (Dr. Rhawn Joseph) ने प्रदिपादित किया है कि पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन सूर्य तथा उसके सौर मण्डल से भी पुराना है। जोसेफ की बात सुनने में अविश्वसनीय लगती है मगर अपनी बात के पक्ष में उन्होंने जो तथ्य जुटाए हैं उन्हें झुठलाना मुश्किल है।

वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार पृथ्वी की उम्र 4 अरब 54 करोड़ वर्ष है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 3 अरब 80 करोड़ वर्ष पूर्व तक के काल को वैज्ञानिक हैडीएन काल कहते हैं। यह पृथ्वी के जीवन का सर्वाधिक कठिनकाल माना जाता है। इस काल में पृथ्वी पर निरन्तर उल्कापात होता रहा था। ज्वालामुखियों की सक्रियता के कारण तापक्रम इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी पिघल गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सतह पर उपस्थित भारी धातुओं ने पृथ्वी के केन्द्र की ओर खिसककर केन्द्रीय सघन भाग का निर्माण किया। उस काल में बनी चट्टानों से प्राप्त सूक्ष्म जीवाष्मों का अध्ययन करने से पता चलता है कि लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाष संश्लेषी जीवन उपस्थित था। यदि यह तथ्य सही है तो मात्र 58 करोड़ वर्ष में रसायनिक प्रक्रियाओं द्वारा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात को सही नहीं माना सा सकता। ऐसे में पृथ्वी के बाहर से जीव के आने का विकल्प ही रहता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि हेडीयन काल में जीवन सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में पृथ्वी पर बरसा होगा। मंगल पर भी लगभग उसी समय जीवन पहुँचा होगा। आज इस बात के पक्ष में प्रबल प्रमाण मिल रहे है कि सूक्ष्म बीजाणु किसी एक ग्रह के वायु मण्डल से निकल कर, अन्तरिक्ष की लम्बी व कठिन यात्रा सफलता पूर्वक पूरी कर, किसी अन्य ग्रह पर उतर सकते हैं। वैज्ञानिको का कहना है कि जीवन की उत्पत्ति, एक बार नहीं होकर, कई बार कई स्थानों पर हुर्ह तथा वहाँ से जीवन हर दिशा में फैलता गया।

डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ के अनुसार हमारे सूर्य व पृथ्वी की उत्पत्ति एक नष्ट हुए तारे के मलवे से हुई होगी। उस तारे के किसी ग्रह पर जीवन उपस्थित था। तारे के नष्ट होने की प्रक्रिया में जब उस तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम हुई तो वह ग्रह उससे छिटक कर अलग हो गया। किसी कारणवश उस ग्रह का विघटन अणु स्तर तक नहीं हुआ। अणु स्तर तक विघटित होने से बचे उस ग्रह के मलबे का उपयोग पृथ्वी के निर्माण में हुआ होगा। स्पष्ट है कि पृथ्वी की उत्पति के साथ ही उस पर जीवन उपस्थित रहा होगा या पृथ्वी के बनने के कुछ करोड़ वर्ष में ही जीवन पृथ्वी पर आगया होगा।

उल्काओं में जैवघटकों की तलाश
जीवन के घटक बाहर अन्तरिक्ष से आने की बात की पुष्टि करने के लिए वैज्ञानिक आजकल पृथ्वी पर गिरी उल्काओं को एकत्रित कर उनका आधुनिक तकनीकी से विष्लेषण कर रहे है। उल्काओं का उपयोग पूर्व में भी किया जाता रहा है मगर उनके पृथ्वी के पदार्थो ये संक्रमित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता था। वर्तमान अनुसंधान में ऐसे नाभकीय क्षारक व उनसे मिलते जुलते अन्य अणु मिले है जो पृथ्वी के रसायन नहीं है। इससे इस बात का सहज अनुमान किया जा कसता है कि अन्तरिक्ष में जीवन के घटक प्रचुर मात्रा में उपस्थित हैं। कार्बनधनी अन्य उल्काओं का अध्ययन करने पर कोषिका के उपापचय चक्रों जैसे साइट्रिक अम्ल चक्र आदि के घटक भी पाए गए हैं। इस अनुसंधान से इस बात का भी संकेत मिलता है कि साइट्रिक अम्ल चक्र जीवन उत्पत्ति के प्रारम्भिक इतिहास में भी उपस्थित थे।

आॅक्सीकारी था पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल?
नए अनुसंधानों से प्रथम जीव की उत्पत्ति के इतिहास की खोज में एक रणनितिक बदलाव आया है। न्यूयार्क के खगोलजैविकी (Astrobiology) केन्द्र के वैज्ञानिकों ने प्राप्त प्राचीनतम खनिजों के आधार पर पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल का जो संघटनात्मक चित्र तैयार किया है वह प्रचलित धारणाओं से मेल नहीं खाता। अब तक यह माना जाता रहा है कि पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल में मिथेन, कार्बन मनो आक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया जैसी जीवन विरोधि गैसों का प्रभुत्व था। आॅक्सीजन की कमी के कारण पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल घोर अपचायक था। र्जिकोन्स के अध्ययन से प्राप्त जानकारी के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद मात्र 50 करोड़ वर्ष की अवधि में ही वर्तमान वायुमण्डल बन गया था। कुछ वैज्ञानिक इस सीमा तक तो आगे नहीं बढ़ते हैं मगर वे भी मानते है कि वायु मण्डल में आॅक्सीजन युक्त गैसों जैसे कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, जल वाष्प आदि का प्रभुत्व अवष्य था। यदि इस बात को स्वीकार किया जाता है तो जीव की प्रथम उत्पत्ति के विषय में अब तक दिए गए सिद्वान्तों को छोड़ना होगा क्योंकि वे अपचायक वायुमण्डल को ध्यान में रख कर दिए गए है। 

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न प्रकार के विचार प्रकट किए जाते रहे हैं मगर अभी किसी एक के पक्ष में आम सहमति नहीं बन पाई है। अभी तक ‘‘जितने मुँह उतनी बातें’’ जैसी स्थिति बनी हुई है। कुछ वैज्ञानिक जीव की उत्पत्ति को विशुद्ध प्राकृतिक संयोग मानते हैं तो ऐसे वैज्ञानिकों की भी कमी नहीं है जो जीवन की उत्पत्ति में ईश्वरीय योगदान की सम्भावना को नकारने के लिए तैयार नहीं है। अनुसंधानों का दौर अभी जारी है। बहुत सम्भव है कि जल्दी हमें किसी नए सिद्धान्त के प्रतिपादन की सूचना मिले। 
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लेखक परिचय:

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हिन्दी के चर्चित विज्ञान लेखक हैं। 25 वर्षों तक विज्ञान अध्यापन के बाद आप श्री बांगण राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। आपके विज्ञान विषयक आलेख वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त होते रहे हैं। साथ ही आपकी विज्ञान विषयक 10 पुस्तकें भी प्रकाशि‍त हो चुकी हैं, जिनमें एक बाल विज्ञान कथा संग्रह भी शामिल है। इसके अतिरिक्त विज्ञान लेखन के लिए आपको राजस्थान साहित्य अकादमी सहित अनेक संस्थाएं पुरस्कृत/सम्मानित भी कर चुकी हैं।

Monday, 1 February 2016

World First: Nanobot Micromotors Deliver Medical Payload Inside Living Creature

IN BRIEF
In a world first, researchers from the University of California have reportedly delivered medicine directly to the stomach of a living organism using nanobots.


NANOBOTS

Scientists from the University of California are claiming that they have managed to deliver a medical payload directly into the gut tissue of a live organism using micro-motored nanobots.

Notably, the team behind the work notes that these little, microscopic machines can travel inside of the living creature and deliver the medical treatment without causing any harmful side effects related to the small bots.

Using micro-motor powered nanobots propelled by gas bubbles made from a reaction with the contents of the stomach in which they were deposited, these miniature machines have been successfully deployed in the body of a live mouse.

The tubular nanobots, which are about 20 micrometers long, 5 micrometers in diameter, and coated in zinc, are propelled by gas bubbles that are produced once the zinc reacts with the hydrochloric acid in the digestive system.

The nanobots travel at speeds of up to 60 micrometers per second and embed themselves in the stomach walls…where they remain after a full 12 hours.

MICROMACHINES

These nanobots have been previously used on organic tissue, but this marks the first time that it was tested on a living organism. The success of this test leads researchers behind the study to further explore the technology as a way to deliver targeted drugs in humans.

However, as is always the case with medical breakthroughs, treatments must undergo rigorous testing and get approval from the FDA (Food and Drug Administration) before they can be used. possible application and testing on humans will need to be studied carefully before regulatory organizations give the go-ahead.

So there is no guarantee that this will be implemented, but it is exciting research.
The study, published in the journal ACS nano, has yet to make announcements regarding the possibility of human-based trials or when such trials may begin.

Sunday, 31 January 2016

पृथ्वी के बाहर जीवन की वैज्ञानिक खोज : परग्रही जीवन श्रंखला भाग २

अंतरिक्ष मे जीवन की खोज करने वाले विज्ञानीयो के अनुसार अंतरिक्ष मे जीवन के बारे मे कुछ भी निश्चित कह पाना कठीन है। हम ज्ञात भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के नियमो के अनुसार कुछ अनुमान ही लगा सकते है।

अंतरिक्ष मे जीवन की खोज से पहले यह सुनिश्चित कर लेना आवश्यक है कि किसी ग्रह पर जीवन के लिये मूलभूत आवश्यकता क्या है? 
पृथ्वी पर जीवन और जीवन के विकास के अध्यन तथा ज्ञात भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के नियमो के अनुसार अंतरिक्ष मे जीवन के लिये जो आवश्यक है उनमे से प्रमुख है:
● द्रव जल,
● कार्बन और
● DNA जैसे स्वयं की प्रतिकृति बनाने वाले अणु।

वैज्ञानिको का मानना है कि जीवन के लिये द्रव जल की उपस्थिती अनिवार्य है। अंतरिक्ष मे जीवन की खोज के लिये पहले द्रव जल को खोजना होगा। द्रव जल अन्य द्रवो की तुलना मे सार्वभौमिक विलायक(Universal Solvent) है, जिसमे अनेको प्रकार के रसायन घूल जाते है। द्रव जल जटिल अणुओ के निर्माण के लिये आदर्श है। द्रव जल के अणु सामान्य है और ब्रम्हाण्ड मे हर जगह पाये जाते है जबकि बाकि विलायक दुर्लभ है।

हम जानते है कि जीवन के लिये कार्बन आवश्यक है क्योंकि इसकी संयोजकता(Valencies) चार है और यह चार अन्य अणुओ के साथ बंध कर असाधारण रूप से जटिल अणु बना सकता है। विशेषतः कार्बण अणु की श्रंखला बनाना आसान है जोकि हायड़्रोकार्बन और कार्बनीक रसायन का आधार है। चार संयोजकता वाले अन्य तत्व कार्बन के जैसे जटिक अणु नही बना पाते है।
स्टेनली मीलर और हैराल्ड उरे द्वारा किया गया प्रयोग

१९५३ मे स्टेनली मीलर और हैराल्ड उरे द्वारा किये गये प्रयोग ने यह सिद्ध कीया था कि सहज जीवन निर्माण यह कार्बनीक रसायन का प्राकृतिक उत्पाद है। उन्होने अमोनिया, मीथेन और कुछ अन्य रसायन (जो पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था मे थे) के घोल को एक फ्लास्क मे लीया और उसमे से विद्युतधारा प्रवाहित की और इंतजार करते रहे। एक सप्ताह मे ही उन्होने फ्लास्क मे अमीनो अम्ल (Amino Acid) को निर्मीत होते देखा। विद्युत धारा अमोनिया और मीथेन के कार्बन बंधनो को तोड़कर उन्हे अमीनो अम्ल मे बदलने मे सक्षम थी। अमीनो अम्ल प्रोटीन का प्राथमिक रूप है। इसके बाद मे अमीनो अम्ल को उल्काओ मे और गहन अंतरिक्ष के गैस के बादलो मे भी पाया गया है।

जीवन का मूलभूत आधार है स्वयं की प्रतिकृति बनाने वाले अणु जिन्हे हम डी एन ए कहते है। रसायन विज्ञान मे इस तरह के स्वयं की प्रतिकृति बनाने वाले अणु दूर्लभ है। पृथ्वी पर पहले डीएनए के अणु के निर्माण के लिये करोड़ो वर्ष लगे। संभवतः ये अणु सागर की गहराईयो मे बने। यदि कोई मीलर-उरे के प्रयोग को करोड़ो वर्ष तक सागर मे जारी रखे तो डीएनए के अणु सहज रूप से बनने लगेंगे। प्रथम डीएनए के अणु का निर्माण शायद सागर की गहराईयो मे ज्वालामुखी के मुहानो हुआ होगा क्योंकि ज्वालामुखी के मुहानो की गतिविधीया इन अणुओ के निर्माण के लिये आवश्यक उर्जा देने मे सक्षम है। यह प्रकाश संश्लेषण से के आने से पहले की गतिविधियां है। यह ज्ञात नही है कि डीएनए के अणुओ के अलावा अन्य कार्बन के जटिल अणु स्वयं की प्रतिकृती बना सकते है या नही लेकिन स्वयं की प्रतिकृती बना लेने वाले अणु डीएनए के जैसे ही होंगे।

जीवन के लिये संभवतः द्रव जल, हायड्रोकार्बन रसायन और डीएनए जैसे स्वयं की प्रतिकृती बनाने वाले अणु चाहीये। इन शर्तो का पालन करते हुये ब्रम्हाण्ड मे जीवन की संभावना की मोटे तौर पर गणना की जा सकती है। १९६१ मे कार्नेल विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री फ्रेंक ड्रेक ने सर्वप्रथम ऐसी ही एक गणना की थी। मंदाकिनी आकाशगंगा मे १०० बीलीयन तारे है, इसमे से आप सूर्य के जैसे तारो का अनुमान लगा सकते है, उसके बाद उनमे से ग्रहो वाले तारो का अनुमान लगा सकते है।
ड्रेक का समिकरण बहुत सारे कारको को ध्यान मे रखते हुये आकाशगंगा मे जीवन की गणना करता है। इन कारको मे प्रमूख है
1. आकाशगंगा मे तारो की जन्मदर
2. ग्रहो वाले तारो का अंश
3. तारो पर जीवन की संभावना वाले ग्रहो की संख्या
4. जीवन उत्पन्न करने वाले वास्तविक ग्रहो का अंश
5. बुद्धीमान जीवन उत्पन्न करने वाले ग्रहो का अंश
6. बुद्धिमान सभ्यता द्वारा सम्पर्क रखने की इच्छा और निपुणता का अंश
7. सभ्यता का अपेक्षित जीवनकाल

उचित आकलन लगाने के बाद और इन सभी प्रायिकताओ का गुणन करने के बाद पता चलता है कि अपनी आकाशगंगा मे ही १०० से १०००० ग्रह ऐसे होगें जिनपर बुद्धीमान जीवन की संभावना है। यदि यह बुद्धीमान जीवन आकाशगंगा मे समान रूप मे वितरित है तब हमारे कुछ सौ प्रकाश वर्ष मे ही बुद्धीमान जीवन वाला ग्रह होना चाहीये। १९७४ मे कार्ल सागन के अनुसार हमारी आकाश गंगा मे ही १० लाख सभ्यताये होना चाहीये। (ड्रेक के समीकरण का उल्लेख कार्ल सागन ने इतनी बार किया है कि इस समीकरण को सागन का समिकरण भी कहा जाता है।)

इन गणनाओ ने सौर मंडल से बाहर जीवन की संभावनाओ की खोज के लिये नये औचित्य दिये है। पृथ्वी बाह्य जीवन पाने ही इन संभावनाओ के कारण विज्ञानीयो अब गंभीर रूप से इन ग्रहो से उत्सर्जीत रेडीयो संकेतो पर ध्यान देना शुरू किया है। आखीर ये बुद्धीमान सभ्यताये भी हमारी तरह टीवी देखती होंगी ही या रेडीयो सुनती ही होंगी !

Source:-https://vigyanvishwa.wordpress.com/2011/01/24/alienlifesearch/

Saturday, 30 January 2016

उड़नतश्तरीयां : परग्रही जीवन श्रंखला भाग 1

कुछ लोगो का विश्वास है कि परग्रही प्राणी उड़नतश्तरीयो से पृथ्वी की यात्रा कर चूके है। वैज्ञानिक सामान्यतः उड़नतश्तरी के समाचारो पर विश्वास नही करते है और तारो के मध्य की विशाल दूरी के कारण इसकी संभावना को रद्द कर देते है। वैज्ञानिको इस ठंडी प्रतिक्रिया के बावजूद उड़नतश्तरी दिखने के समाचार कम नही हुये है।
१९५२ मे न्युजर्सी स रा अमरीका मे दिखायी दी कथित उड़नतश्तरी का चित्र

उड़नतश्तरीयो के देखे जाने के दावे लिखित इतिहास की शुरुवात तक जाते है। बाईबल मे ईश्वर के दूत इजेकील ने रहस्यमय ढंग से आकाश मे ’चक्र के अंदर चक्र’ का उल्लेख किया है जिसे कुछ लोग उड़नतश्तरी मानते है। १४५० ईसा पूर्व मिश्र के फराओ टूटमोस तृतिय के काल मे मिश्री(इजिप्त) इतिहासकारो ने आकाश मे ५ मीटर आकार के ’आग के वृत’ का उल्लेख किया है जो सूर्य से ज्यादा चमकदार थे और काफी दिनो तक आकाश मे दिखायी देते रहे तथा अंत मे आकाश मे चले गये। ईसापूर्व ९१ मे रोमन लेखक जूलियस आब्सक्युन्स ने एक ग्लोब के जैसे गोलाकार पिंड के बारे मे लिखा है आकाशमार्ग से गया था। १२३४ मे जनरल योरीतसुमे और उसकी सेना ने क्योटो जापान के आकाश मे रोशनी के गोलो को आकाश मे देखा था। १५५६ मे नुरेमबर्ग जर्मनी मे आकाश मे किसी युद्ध के जैसे बहुत सारे विचित्र पिंडो को देखा था।
हाल की मे स.रा. अमरीका की वायू सेना ने उड़नतश्तरीयो के देखे जाने की घटनाओ की जांच करवायी थी। १९५२ मे ब्लू बूक प्रोजेक्ट के अंतर्गत १२,६१८ घटनाओ की जांच की गयी। इस जांच के निष्कर्षो के अनुसार उड़नतश्तरीयो को देखे जाने की अधिकतर घटनाये प्राकृतिक घटना, साधारण वायुयान या अफवाहें थी। फिर भी ६ प्रतिशत घटनाये ऐसी थी जिन्हे समझ पाना कठिन था। लेकिन कन्डोन रिपोर्ट के निष्कर्षो के अनुसार ऐसे किसी अध्यन का कोई मूल्य ना होने से १९६९ मे प्रोजेक्ट ब्लू बुक को बंद कर दिया गया। यह अमरीकी वायू सेना का उड़नतश्तरीयो के अध्यन का अंतिम ज्ञात शोध अभियान था।
२००७ मे फ्रांस की सरकार ने उडनतश्तरीयो की जांच की एक बड़ी फाईल साधारण जनता के लिये उपलब्ध करायी। इस रिपोर्ट को फ्रांस के राष्ट्रिय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र ने इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिया है। इसके अनुसार पिछले पचास वर्षो मे १६०० उड़नतश्तरीया देखी गयी है. १००,०० पृष्ठ के चश्मदीद गवाहो के बयान, चित्र और ध्वनी टेप लिये गये है। फ्रांस सरकार के अनुसार ९ प्रतिशत घटनाओ को समझा जा सका है, ३३ प्रतिशत के पिछे संभावित कारण हो सकते है लेकिन बाकी घटनाओ के लीये कोई व्याख्या नही है।
इन घटनाओ की स्वतंत्र रूप से जांच संभव नही है। लेकिन तथ्यात्मक रूप से सावधानीपूर्वक अध्यन से अधिकतर उड़नतश्तरी की घटनाओ को निम्नलिखित कारणो मे से किसी एक के कारण माना जा सकता है:
१. शुक्र ग्रह: जो चन्द्रमा के बाद रात्री आकाश मे सबसे चमकदार पिंड है। पृथ्वी से अपनी विशाल दूरी के कारण यह ग्रह कार चालाक को उनका पिछा करता प्रतित होता है, जिससे ऐसा लगता है कि कोई यान आपके पिछे लगा हुआ है। यह कुछ उसी तरह है जिस तरह कारचालको चन्द्रमा उनका पिछा करते हुये प्रतीत होता है। हम दूरी को अपने आसपास की वस्तु के संदर्भ मे मापते है। शुक्र और चन्द्रमा आकाश मे काफी दूरी पर है और आकाश मे उनके संदर्भ के लिये कुछ नही है और वे हमारे आसपास की वस्तुओ के संदर्भ मे नही चलते है और हमे उनके हमारे पीछा करने का दृष्टीभ्रम होता है।
२. दलदली गैस : दलदली क्षेत्र मे तापमान के परिवर्तन होने पर दलदल से उत्सर्जित गैस जमीन से कुछ उपर तैरती रहती है और यह गैस थोड़ी चमकदार भी होती है। गैस के छोटे टुकड़े बड़े टुकड़ो से टूटकर अलग होते है और ऐसा भ्रम होता है कि छोटे यान बड़े मातृ यान से अलग होकर जा रहे है।
३. उल्का : कुछ ही क्षणो मे रात्री आकाश के पार प्रकाश की चमकदार रेखाओ के रूप मे उल्का किसी प्राणी चालित यान का भ्रम उत्पन्न करती है। ये टूट भी जाती है जिससे भी ऐसा भ्रम होता है कि छोटे यान बड़े मातृ यान से अलग होकर जा रहे है।
सेन्टीलीनीयल बादल कभी कभी उड़नतश्तरी जैसे दिखते है।

४. वातावरण की प्राकृतिक घटनाये : तड़ित युक्त तुफान और असाधारण वातावरण की घटनाये भी कभी कभी आकाश को असामान्य विचित्र रूप से प्रकाशित कर देती है जिनसे भी उड़नतश्तरीयो का भ्रम होता है। सेन्टीलीनीयल बादल भी उड़नतश्तरीयो के जैसे प्रतित होते है।
बीसवीं और इक्कीसवी सदी मे निम्नलिखित कारक भी उड़नतश्तरीयो का भ्रम उत्पन्न कर सकते है;
१. राडार प्रतिध्वनी: राडार तरंगे पर्वतो से टकराकर प्रतिध्वनी उत्पन्न कर सकती है जिन्हे राडार निरिक्षक पकड़ सकता है। यह तरंगें जीगजैग करते हुये और अत्यधिक गति से राडार के परदे पर देखी जा सकती है क्योंकि ये प्रतिध्वनी है।
२.मौसम और शोध के गुब्बारे : एक विवादित सैन्य दावे के अनुसार १९४७ की प्रसिद्ध रोसवेल न्युमेक्सीको की उड़नतश्तरी दूर्घटना एक मौसम के गुब्बारे की दूर्घटना थी। यह गुब्बारा एक गोपनिय प्रोझेक्ट मोगुल का गुब्बारा था जो आकाश मे परमाणु युद्ध की परिस्थितियों मे विकिरण को मापने का प्रयोग कर रहा था।
३. वायुयान : व्यावसायिक और सैन्य वायुयान भी कभी कभी उड़न तश्तरी मान लिये जाते है। यह प्रायोगिक सैन्य वायुयानो जैसे स्टील्थ बमवर्षक यानो के मामलो मे ज्यादा होता है। अमरीकी वायूसेना ने अपने गोपनीय प्रोजेक्टो को पर्दे मे रखने के लिये उड़न तश्तरी देखे जाने की कहानियो को बढा़वा भी दिया था।
४. जानबुझकर फैलायी गयी अपवाह :
जार्ज एडामस्की द्वारा दिया गया उड़नतश्तरी का चित्र जो वास्तव मे मुर्गीयो को दाना देने वाली मशीन का है।
उड़नतश्तरीयो के कुछ प्रसिद्ध चित्र अपवाह है। एक प्रसिद्ध उड़नतश्तरी का चित्र जिसमे खिड़कीया और लैण्ड करने के पैर दिखायी दे रहे है एक मुर्गी को दाना देने वाली मशीन का था।
कम से कम ९५ प्रतिशत उड़नतश्तरीयो की घटनाओ को उपर दिये गये कारणो मे से किसी एक के कारण रद्द किया जा सकता है। लेकिन कुछ प्रतिशत घटनाओ की कोई संतोषजनक व्याख्या नही है। उड़नतश्तरीयो की विश्वासपात्र घटनाओ के लिये आवश्यक है :
अ) किसी स्वतंत्र विश्वासपात्र चश्मदीद गवाह द्वारा एकाधिक बार देखा जाना
ब)एकाधिक श्रोतो के प्रमाण जैसे आंखो और राडार द्वारा उडन तश्तरी की देखा जाना।
ऐसी रिपोर्टो को रद्द करना कठीन होता है क्योंकि इनमे कई स्वतंत्र जांच शामिल होती है। उदाहरण के लिये १९८६ मे अलास्का पर जापान एअरलाईन्स की उड़ान JAL १६२८ द्वारा उड़नतश्तरी का देखा जाना है जिसकी जांच FAA ने की थी। इस उड़नतश्तरी को इस उड़ान के यात्रीयो के अतिरिक्त जमीन के राडार से भी देखा गया था। इसीतरह १९८९-९० मे नाटो के राडारो और जेट इन्टरसेप्टरो द्वारा बेल्जीयम के उपर काले त्रिभूजो को देखा गया था। सी आई ए के दस्तावेजो के अनुसार १९७६ मे इरान के तेहरान के उपर उड़नतश्तरी को देखा गया था जिसमे एक जेट इन्टरसेप्टर एफ ४ के उपकरण खराब हो गये थे।
वैज्ञानिको के लिये सबसे निराशाजनक बात यह है कि उड़नतश्तरियो को देखे जाने की हजारो घटनाओ के बावजूद किसी भी घटना ने एक भी ऐसा सबूत नही छोड़ा है जिसकी किसी प्रयोगशाला मे जांच की जा सके। कोई परग्रही डी एन ए, कोई परग्रही कम्प्युटर चिप या किसी उड़नतश्तरी के उतरने का भौतिक प्रमाण आज तक प्राप्त नही हुआ है।

चश्मदीद गवाहों के बयानो पर आधारित उड़नतश्तरीयों के गुण
यह मानते हुये कि उड़नतश्तरीयां भ्रम ना होकर वास्तविक यान है; हम कुछ ऐसे प्रशन कर सकते है जिससे यह पता चले कि यह किस तरह के यान है। उड़नतश्तरीयो के चश्मदीद गवाहो के बयानो के आधार पर विज्ञानियों ने इनके निम्नलिखित गुण नोट कीये है:
अ) वे हवा मे जीगजैग यात्रा करती है।
ब) वे कार के इंजन को बंद करदेती है और यात्रा के मार्ग मे विद्युत उर्जा को प्रभावित करती है।
क) वे हवा मे निशब्द तैरती है।
इनमे से कोई भी गुण पृथ्वी पर विकसीत किसी भी राकेट से नही मिलता है। उदाहरण के लिये सभी ज्ञात राकेट न्युटन के गति के  तीसरे नियम(हर क्रिया की तुल्य किंतु विपरित प्रतिक्रिया होती है) पर निर्भर है; लेकिन किसी भी उड़नतश्तरी की घटना मे प्रणोदन प्रणाली का वर्णन नही है। परग्रही उड़नतश्तरी को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर जाने के लिये प्रणोदन प्रणाली का होना अत्यावश्यक है। हमारे सभी अंतरिक्ष यानो मे प्रणोदन प्रणाली होती है।
उडनतश्तरीयो द्वारा वायू मे जीगजैग करते हुये उड़ान से उत्पन्न गुरुत्वबल जो पृथ्वी के गुरुत्व से सैकड़ो गुणा ज्यादा होगा, यह पृथ्वी के किसी भी प्राणी को पापड़ के जैसा चपटा कर देने के लिये काफी है।
क्या उड़नतश्तरीयो के ऐसे गुणो की आधुनिक विज्ञान द्वारा व्याख्या की जा सकती है ?
स्वचालित उड़नतश्तरियां या अर्धमशीनी चालक
हालीवुड की फिल्मे जैसे “अर्थ वर्सेस द फ्लाईंग सासर” यह मानती है कि उड़नतश्तरीया परग्रही प्राणियो द्वारा चालित होती है। लेकिन यह संभव है कि उड़नतश्तरीयां स्वचालित हो या इसके चालक अर्धमशीनी हो। स्वचालित यान या अर्धमशीनी चालक जीगजैग उड़ान से उत्पन्न गुरुत्व बल को झेल सकता है जो कि किसी प्राणी को कुचलने मे सक्षम है।
एक यान जो किसी कार के इंजन को बंद कर सकता है और वायु मे शांति से गति कर सकता है, चुंबकिय बल से चालित होना चाहिये। लेकिन चुंबकिय प्रणोदन के साथ समस्या यह है कि वह हमेशा दो ध्रुवो के साथ आता है, एक उत्तर ध्रुव और एक दक्षिण ध्रुव। कोई भी द्विध्रुवी चुंबक पृथ्वी पर उपर उड़ने की बजाये कम्पास की सुई के जैसे घुमते रह जायेगा क्योंकि पृथ्वी स्वंय एक चुंबक है। दक्षिणी ध्रुव एक दिशा मे गति करेगा जबकि उत्तरी ध्रुव विपरित दिशा मे, इससे चुंबक गोल घूमते रहेगा और कहीं नही जा पायेगा।
एकध्रुविय चुंबक
इस समस्या का समाधान एकध्रुवीय चुंबक का प्रयोग है, अर्थात ऐसा चुंबक जिसका एक ही ध्रुव हो, उत्तर ध्रुव या दक्षिण ध्रुव। सामान्यतः किसी चुंबक को आधे से तोड़ने पर दो एकध्रुव चुंबक नही बनते है, उसकी बजाय दोनो टूकड़े अपने अपने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवो के साथ द्विध्रुवीय चुंबक बन जाते है। इसतरह आप किसी चुंबक को तोड़ते जाये, हर टूकड़ा अपने अपने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों द्विध्रुवीय चुंबक ही रहेगा। ऐसा परमाण्विक स्तर तक पहुंचते तक जारी रहेगा जहां परमाणु स्वयं द्विध्रुवीय है।
विज्ञानियो के सामने समस्या है कि एकध्रुवीय चुंबक प्रयोगशाला मे कभी नही देखा गया है। भौतिकी विज्ञानियो ने अपने उपकरणो से एकध्रुवीय चुंबक के चित्र लेने के प्रयास किये है लेकिन असफल रहे है।(१९८२ मे स्टैनफोर्ड विश्व विद्यालय मे ली गयी एक अत्यंत विवादास्पद तस्वीर इसका अपवाद है।)
एकध्रुवी चुंबक को प्रयोगशाला मे नही देखा गया है लेकिन भौतिकी विज्ञानियो का मानना है कि ब्रह्माण्ड के जन्म के तुरंत पश्चात एकध्रुविय चुंबक की बहुतायत रही होगी। यह धारणा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के महाविस्फोट(Big Bang) आधारित आधुनिक सिद्धांतो पर आधारित है, एकध्रुवीय चुंबक  का घनत्व ब्रह्माण्ड के विस्तार के साथ कम होता गया है, और आज वे दूर्लभ हो गये है। तथ्य यह है कि एकध्रुवीय चुंबक का दूर्लभ होने ने ही विज्ञानियो को विस्तृत होते ब्रह्माण्ड के सिद्धांत के प्रतिपादन के लिये प्रोत्साहित किया है। इसलिये सैधांतिक रूप से एक ध्रुवीय चुंबक का आस्तित्व भौतिकी मे पहले से ही संभव है।
यह माना जा सकता है अंतरिक्ष यात्रा मे सक्षम परग्रही प्रजाति महाविस्फोट(Big Bang) के पश्चात शेष मौलिक एकध्रुवीय चुंबको को अंतरिक्ष मे एक बड़े चुंबकिय जाल से समेट कर अपने प्रयोग मे ला सकती है। जैसे ही उनके पास पर्याप्त एकध्रुव चुंबक जमा हो गये वे अंतरिक्ष मे फैली चुंबकीय रेखाओ पर सवार होकर बिना किसी प्रणोदन के यात्रा कर सकते है। एकध्रुवीय चुंबक भौतिकविज्ञानियो के आकर्षण का केन्द्र है और एक ध्रुवीय चुंबक आधारित यान विज्ञान की अभी तक ज्ञात अवधारणा के अनुरूप है।
नैनो टेक्नालाजी(नैनो अंतरिक्षयान)
ऐसी कोई भी परग्रही सभ्यता जो ब्रह्मांड मे कहीं भी अंतरिक्षयान भेज सकती है , नैनो टेक्नालाजी का ज्ञान अवश्य रखती होगी। इसका अर्थ यह है कि उनके अंतरिक्षयानो का विशालकाय होना आवश्यक नही है। नैनो अंतरिक्षयान लाखो की संख्या मे अंतरिक्ष मे ग्रहो पर जीवन की थाह लेने के लिये भेजे जा सकते है। ग्रहो के चन्द्रमा ऐसे नैनो अंतरिक्ष यानो के लिये आधारकेन्द्र हो सकते है। यदि ऐसा है तो भूतकाल मे वर्ग ३ की सभ्यता हमारे चन्द्रमा की यात्रा कर चूकी है। यह संभव है कि ये यान स्वचालित और रोबोटिक होंगे और चन्द्रमा पर आज भी होंगे। मानव सभ्यता को पूरे चन्द्रमा पर ऐसे नैनो अंतरिक्ष यानो के अवशेष या प्रमाण की खोज मे सक्षम होने मे अभी एक शताब्दी और लगेगी।
यदि हमारे चन्द्रमा की परग्रही सभ्यता यात्रा कर चूके है या वह उनके नैनो अंतरिक्ष यानो का आधारकेन्द्र रहा है तो कोई आश्चर्य नही कि उड़नतश्तरीयां विशालकाय नही होती है। कुछ विज्ञानी उड़नतश्तरीयो को इस लिये भी अफवाह मानते है क्योंकि वे किसी भी विशालकाय प्रणोदन प्रणाली के अभिकल्पन(Design) के अनुरूप नही है। उनके अनुसार ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष यात्रा के लिये विशालकाय प्रणोदन प्रणाली आवश्यक है जिसमे रैमजेट संलयन इंजीन, विशालकाय लेजरचालित पाल तथा नाभिकिय पल्स इंजिन है जोकि कई किलोमीटर चौड़े हो सकते है। उड़नतश्तरीयां जेट विमान के जैसे छोटी नही हो सकती है। लेकिन यदि चन्द्रमा पर उनका आधार केन्द्र है तो वह छोटी हो सकती है और वे चन्द्रमा पर अपने आधारकेन्द्र से इंधन ले सकती है। उड़न तश्तरीयो को देखे जाने की घटनाये चन्द्रमा के आधारकेन्द्र से आ रहे स्वचालित प्राणी रहित  यानो की हो सकती है।
ब्रह्माण्ड की विशालकाय दूरी
उड़नतश्तरीयों के विरोध मे सबसे बड़ा तर्क है कि ब्रह्मांड इतना विशाल है कि इसकी दूरीयों को पार कर उड़नतश्तरीयों का पृथ्वी तक आना लगभग असंभव है। पृथ्वी तक पहुंचने के लिए प्रकाश गति से भी तेज़ चलने वाला यान चाहिये जो कि मानव द्वारा ज्ञात भौतिकी के नियमों के विरूद्ध है। पृथ्वी के निकट का तारा भी ४ प्रकाशवर्ष दूर है, प्रकाशगति से चलने वाले यान को भी वहां से पृथ्वी तक आने मे ४ वर्ष लगेंगे। कुल यात्रा के कम से कम आठ वर्षो की यात्रा के लिए सक्षम यान को विशालकाय होना चाहिये। अब तक उड़नतश्तरीयो की जितनी भी रिपोर्ट मिली है उसमे उड़नतश्तरीयां विशालकाय नही हैं।
परग्रही जीवन और भविष्य
सेटी प्रोजेक्ट मे आयी तेजी और तेजी से खोजे जा रहे सौर बाह्य ग्रहो से ऐसा प्रतित होता है कि यदि हमारे समीप कहीं बुद्धिमान जीवन है तो एक शताब्दि के अंदर उनसे संपर्क स्थापित हो सकता है। कुछ प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है जैसे:
यदि परग्रही सभ्यता का अस्तित्व है, क्या हम कभी उन तक पहुंच पायेंगे ?
जब सूर्य की मृत्यु होगी हमारा भविष्य क्या होगा ?
क्या हम किसी दूसरे तारे तक पहुंच मानव सभ्यता को बचा पायेंगे ?
क्या हमारा भविष्य इन तारो मे ही निहीत है ?
इन सभी प्रश्नो का उत्तर भविष्य के गर्भ मे है।

Global Positioning System

Since  ages  man  has  invented  various  instruments  to  assist  him  in  navigation  on  earth.  Magnetic compass  is  one  of  the  oldest  navigational  instrument  man  has  been  using  for  many  centuries  for direction  identification  on  earth’s  surface.  
Global  Positioning  System  (GPS)  based  devices  are  the latest  navigation  assistance  devices  used  these  days.  GPS  devices  provide  accurate  real  time  location and  much  more  information  to  its  user  for  easier  and  comfortable  navigation  even  through  his  or  her local  streets.  A  commonly  available  GPS  device  is  shown  in  the  figure.  When  fitted  in  a  car,  it  shows speed of the car, time, longitude coordinates and map of near-by area. 

What  is Global  Positioning  System  (GPS)?
Global  positioning  system  GPS  is  a  method  of  identifying  location  or  position  of  any  point  (or  a person)  on  earth  using  a  system  of  24  satellites,  which  are  continuously  orbiting,  observing, monitoring  and  mapping  the  earth  surface.  Every  such  satellite  revolves  around  earth  twice  a  day  at  a distance  of  about  20000  km  from  it.  The  given  figure  shows  sketch  view  of  24  GPS  satellites  orbiting around  the  earth.   The  orbits  of  these  satellites  are  so  aligned  that  at  least  four  of  them  always  keep  looking  any  given point  on  earth  surface.  This  is  minimum  necessary  requirement  for  correct  and  accurate  location identification  through  this  system.  In  the  given  figure,  the  given  location  at  the  instant  is  visible  to  12 satellites. 

Working  principle  of  a  GPS  device 
For  using  the  GPS  system  of  satellites,  a  person  needs  a  GPS  device  fitted  with  a  transmitter/receiver for  sending/receiving  signals  (electromagnetic  radio  waves)  so  that  it  can  link  up  with  GPS  satellites in real time.   The  unique  location  (or  longitude  coordinates)  of  a  GPS  user  is  determined  by  measuring  its  distance from  at  least  three  GPS  satellites.  Based  on  these  distance  measurements,  the  location  calculations  are done  by  the  microprocessor  (computing  device) fitted in the  GPS  device. For  measuring  distance  of  three  GPS  satellites  from  the  GPS  device  user,  the  time  taken  by  a  radio signal to travel from  device  to satellites and  back are  recorded by  the  GPS  device. 
For, example,  if a  radio  signal takes 0.140 seconds  to travel back  from a satellite-1 to its GPS  user.  

Following  the  above  method, let D1, D2  and D3  be  the distances of  three  satellites from a  GPS  device user.  From  this  information,  the  identification  of  unique  location  of  the  GPS  device  user  is  done  as follows: 

(1)  If  user  is  at  a  distance  “D1”  from  satellite-1.  Then  user’s  location  can  be  anywhere  on  a circumference of circle of radius “D1” from satellite-1 as shown in fig below. 
(2)  If  user  is  at  a  distance  “D2”  from  satellite-2.  Then  user’s  location  can  be  either  at  intersecting points  X  or  Y  of  circumferences  of  circles  of  radius  D1  and  D2  from  satellite-1  and  2 respectively as shown in figure below. 
(3)  If  user  is  at  a  distance  “D3”  from  satellite-3.  Then  user’s  location  will  be  at  the  intersecting point  of circumferences  of  circles  of  radius  D1,  D2  and  D3  from  satellite-1,  2  and  3  respectively  as shown in fig(c). i.e. here user is at point Y.
This  way,  minimum  three  satellites  together  provide  the  exact  location  (longitude  coordinates)  of  the GPS  device  user  on his  display  board.   
If  a  person  is  at  some  height  on  earth  surface,  then  using  distance  information  from  minimum  4-GPS satellites even altitude  of  the  user can also be measured. 

It  may  be  noted  that  since  all  24-GPS  satellites  orbit  in  predefined  orbits,  therefore  their  locations  are precisely  predetermined.  It  is  these  known locations  of  3  or  4  -GPS  satellites  (3  or  4  sets  of  longitude coordinates)  and  their  distances  to  GPS  device  that  assist  a  GPS  user  (i.e.  its  computing  device)  in locating  its own longitude  coordinates. 

Applications  of GPS   Global positioning system  has many  day-to-day  applications:   
It helps in navigation on water, air and land.   
It assists in map designing of a  location.   
It helps  automatic  vehicle  movements (without  man)   
One can measure  speed of moving object using this technology.   
One can locate  change  in  position of  glaciers, mountains heights.   
It assists in keeping standard time  world over.   
It  assists  in  tracking  animals  and  birds  and  studying  their  movements  by attaching  GPS devices to their bodies.     
It assists in  airplane  traffic  movement.  
It assists visually impaired in location identification.

Now-a-days,  various  devices  like  mobile  phones,  i-pad  etc.  come  equipped  with  pre-loaded geographical  maps  and  GPS  software  which  identifies  the  location  of  these  devices  using  GPS system. GPS is a free service available to anyone in the world with a GPS device.

Source:- CBSE ONLINE STUDY MATERIAL

Friday, 15 January 2016

Airborne Wind Turbine: To Bring Renewable Energy and WiFi


An airborne wind turbine is a design concept for a wind turbine with a rotor supported in the air without a tower,[ thus benefiting from more mechanical and aerodynamic options, the higher velocity and persistence of wind at high altitudes, while avoiding the expense of tower construction, or the need for slip rings or yaw mechanism. An electrical generator may be on the ground or airborne.
In an effort to harness strong high-altitude winds, the company Altaeros Energies has developed a floating wind turbine that’s a cross between a traditional windmill and a blimp. After some successful tests, the Altaeros team is confident that this new levitating wind turbine will be a viable clean energy option for remote villages and military sites.


The design of the Altaeros’ Airborne Wind Turbine is pretty simple. An inflatable, helium-filled shell lifts it off the ground to high altitudes, where winds are much stronger than at ground level. The airborne turbines are held steady by strong tethers, which send electricity generated by the turbine back down to the ground.
“For decades, wind turbines have required cranes and huge towers to lift a few hundred feet off the ground where winds can be slow and gusty,” said Airborne Wind Turbine inventor Ben Glass in a release. At higher altitudes, not only are winds more than five times stronger, but they’re also more consistent.

Altaeros Energies was founded in 2010 by MIT and Harvard alums. Earlier this year, the team completed testing of a 35-foot scale prototype of the Airborne Wind Turbine in Limestone, Maine. There, the floating turbine climbed to 350 feet off the ground, generated power, and landed in an automated cycle. According to a press release, the prototype produced more than twice as much power at high altitude than generated at conventional tower height.
There are of course other benefits to having a wind turbine that floats high above the ground. For one, it produces very little noise, and it requires little maintenance (and what maintenance it does require can be done at ground level). Additionally, the inflatable shroud covering the wind turbine blocks the spinning blades from being visible to nearby communities.


Thursday, 7 January 2016

Coronary MegaVac Mechanical Thrombectomy System

How it Works

See this video at.

Occlude

Position MegaVac proximal to target clot and deploy. The catheter then occludes the vessel and arrests blood flow. Stoppage of blood flow prevents clot fragments from traveling downstream.

Aspirate

Once deployed, clot is aspirated through the catheter using a VacLok syringe. Since blood flow has been arrested, the aspiration efficiency is much higher than can be achieved with existing technologies.

Retract

If there is residual clot after the initial aspiration, the ThromboWire is inserted through the MegaVac, through (distal to) clot, and deployed. While aspirating with the MegaVac, the ThromboWire is simultaneously retracted, macerating clot and pulling it into and out of the catheter.

Tuesday, 5 January 2016

Electric eel - How it generate a high voltage.



The electric eel (Electrophorus electricus) is an electric fish, and the only species in that genus. Despite the name, it is not an eel, but rather a knifefish.


The electric eel has three pairs of abdominal organs that produce electricity: the main organ, the Hunter's organ, and the Sach's organ. These organs make up four-fifths of its body, and are what gives the electric eel the ability to generate two types of electric organ discharges: low voltage and high voltage. These organs are made of electrocytes, lined up so a current of ions can flow through them and stacked so each one adds to a potential difference. When the eel locates its prey, the brain sends a signal through the nervous system to the electrocytes. This opens the ion channels, allowing sodium to flow through, reversing the polarity momentarily. By causing a sudden difference in electric potential, it generates an electric current in a manner similar to a battery, in which stacked plates each produce an electric potential difference. In the electric eel, some 5,000 to 6,000 stacked electroplaques are capable of producing a shock at up to 860 volts and 1 ampere of current (600 watts) for a duration of two milliseconds. It would be extremely unlikely for such a shock to be deadly for an adult human, due to the very short duration of the discharge. Atrial fibrillation requires that roughly 700 mA be delivered across the heart muscle for 30 ms or more, far longer than the eel is able to produce. Still, this level of current is reportedly enough to produce a brief and painful numbing shock likened to a stun gun discharge, which due to the voltage can be felt for some distance from the fish; this is a common risk for aquarium caretakers and biologists attempting to handle or examine electric eels.
The Sach's organ is associated with electrolocation. Inside the organ are many muscle-like cells, called electrocytes. Each cell can only produce 0.15 V, though the organ can transmit a signal of nearly 10 V overall in amplitude at around 25 Hz in frequency. These signals are emitted by the main organ; the Hunter's organ can emit signals at rates of several hundred hertz.
The electric eel is unique among the Gymnotiformes in having large electric organs capable of producing potentially lethal discharges that allow them to stun prey. Larger voltages have been reported, but the typical output is sufficient to stun or deter virtually any animal. Juveniles produce smaller voltages (about 100 V). They are capable of varying the intensity of the electric discharge, using lower discharges for hunting and higher intensities for stunning prey or defending themselves. They can also concentrate the discharge by curling up and making contact at two points along its body. When agitated, they are capable of producing these intermittent electric shocks over a period of at least an hour without tiring.
The electric eel also possesses high frequency-sensitive tuberous receptors, which are distributed in patches over its body. This feature is apparently useful for hunting other Gymnotiformes.

Source:- Wikipedia

Monday, 4 January 2016

सौरमंडल के महत्त्वपूर्ण तथ्य

सौरमंडल के महत्त्वपूर्ण तथ्य
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सबसे बड़ा ग्रह --------------------बृहस्पति (Jupiter)
सबसे छोटा ग्रह -------------------बुध (Mercury)
पृथ्वी का उपग्रह -------------------चन्द्रमा (Moon)
सूर्य से सबसे निकट ग्रह ----------बुध (Mercury)
सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह ------वरूण (Neptune)
पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह ---------शुक्र (Venus)
सबसे अधिक चमकीला ग्रह ------- शुक्र (Venus)
सबसे अधिक चमकीला तारा ---- साइरस (Dog Star)
सबसे अधिक उपग्रहों वाला ग्रह ----बृहस्पति व शनि
सबसे अधिक ठण्डा ग्रह ----------वरूण (Neptune)
सबसे अधिक भारी ग्रह ---------- बृहस्पति (Jupiter)
रात्री में लाल दिखाई देने वाला ग्रह ----- मंगल (Mars)
सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह ---    गैनीमेड (Gannymede)
सौरमंडल का सबसे छोटा उपग्रह- डी मोस (Deimos)
नीला ग्रह ------------------------------ पृथ्वी (Earth)
भोर का तारा ------------------------शुक्र (Venus)
साँझ का तारा ------------------------ शुक्र (Venus)
पृथ्वी की बहन ------------------------ शुक्र (Venus)
सौन्दर्य का देवता ---------------------शुक्र (Venus)
हरा ग्रह ----------------------------- वरूण (Neptune)
विशाल लाल धब्बे वाला ग्रह ------ बृहस्पति (Jupiter)